Friday, 8 September 2017

क्या मिलता है ?





आखिर क्या मिलता है ?
-राय साहब पांडेय
माँ जब बेल रही थी रोटी,
 और बच्चा खींचता धोती,
तो माँ है जुगत लगाती  
लोई की गोली पकड़ाती,
बच्चे को उसमें उलझा कर  
फिर जल्दी सेंकती रोटी,  
 पर माँ की यह चालाकी
बच्चा समझ न पाता,
कैसा होता यह खेल निराला
लगता है कुछ गड़बड़ झाला,
मुग्ध देख शिशु दशन पंक्ति
माँ मन ही मन आह्लादित,
प्रमुदित मन शिशु विह्वल
तल्लीन खेल में हो ओझल,
  माँ अब सोचे क्या मिलता है ?  

  बच्चे सचमुच होते हैं भोले
  पर ना समझो नादान इन्हें,
माँ की यह चतुर जुगत भी
अब ज्यादा काम न आई,
गोली फेंक माँ को जकड़ा
फिर जोर-जोर चिल्लाया,
आटे की गोली का  अमोघ अस्त्र
 जब शिशु मन को ना भाया,
माँ ने गोली के पैर निकाले
फिर कीड़े का रूप बनाया,
शिशु मुख चहक उठा यह देख
पुलकित हो हाथ बढ़ाया,
फिर रगड़-रगड़ कर कीड़े का
हाथ पाँव मुख आँख नाक की
दुर्गति ऐसी कर डाली
कि वह कीड़ा रहा न गोली |
माँ ने झट से फेंक कर बेलन
बच्चे को गोंद उठाया,
गले चिपक कर पीठ जकड़ कर
माँ की कोमल थपकी पा शिशु
स्वप्न लोक में जा पहुंचा |
माँ अब सोचे शिशु का तो है
पता नहीं? पर जान गई मैं
माँ को क्या मिलता है ?

  

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