लेकिन मैं तो औरत हूँ, मैं आ सकती हूँ,
ऐसा तुम कहती हो, बाकी की औरतें नहीं,
हाँ, याद आया, मैं तो विधवा हूँ।
विधवा होना औरत होने का हक खो देना है,
बाकियों के साथ बैठने का भी,
रीति रिवाजों में शामिल होने का भी ।
बाकियों का ईमान होता है, विधवा का नहीं,
मैं दुःख में रो सकती हूँ, सुख में हँस नहीं सकती,
शुभ कार्यो में शामिल नहीं हो सकती।
आज मैं इस पार हूँ, तुम भी इस पार आ सकती हो,
क्योंकि तुम भी एक औरत ही हो !