Friday, 2 March 2018

कइसे खेलबा होरी



कइसे खेलबा होरी –फगुआ (1)
-राय साहब पांडेय

अरे फागुन मास की मस्ती छाइल 
होरी-फगुआ सब नियराइल
ऊपरा से चलेला पवन पुरवाईल
                   सजनवा  होरी कइसे खेलब? (१)

खिड़की दरवज्जा सब बंद करि देइब,
लाइट भी बंद राखब पर्दा लगाइब,
घर के बाहर ताला लटकाइ के
हम सब के  बहकाइब
हो गोरिया –ना खेलब हम होरी (२)

जा तोहसे हम बोलब नाहीं  
फोन लगाइब पड़ोसी के बताईब
पर्दा खोल के, पीटब खिड़किया
लोगन के गोहराईब
सजनवा होरी कइसे खेलब? (३)

जब तूँ देखबू बाहर क हुड़दङवा  
मरि जाबू शरम से भगबू अंदरवां  
लेइके कीचड़ औ वारनिशवा
छोरा रोक लेइहैं, तोहरी डगरिया
हो गोरिया –ना खेलब हम होरी (४)


तूँ आपन जियरा कइ ल कड़क,
हम त एकदम हई बेधड़क
कम नइखे रचिकौ हमहूँ,
छीन के रंग देबै(२), उनका सब चेहरवा
हो गोरिया- ऐसे खेलब हम होरी (५)

धनिया तूँ मत होख उदास,
हम त करत रहनी मजाक,
प्यार-दुलार की होली मनाउब,  
 का होई रंग औ गुलाल ,
हो गोरिया- ऐसे खेलब हम होरी (६)


1 comment:

  1. आशा करता हूँ अपने होली छक के खेली इस बार। कविता तो यही बोल रही है।मन की सारी परत खोल रही है---बड़े सुंदर रसिया भाव आपके हुड़दंग मचा रहे है। सुंदर कविता है जिसमे गुझिया की मिठास है-और मस्ती की प्यास है। रचना बड़ी नमकीन है चटक।
    होली की रंगभरी शुभकामनाएं डॉ राय साहब पांडे जी

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