ईश्वर-अल्लाह की हार
-डॉ राय साहब पाण्डेय
रूह काँप उठेंगी,
आने वाली नस्लें जब पूछेंगी,
स्वर्गों-नरकों में भी,
क्या चैन तुम्हें मिल पायेगा ?
करते हो अपमान धरम का,
अपनी दंगाई करतूतों से,
सह सकोगे भार जमीरों पर,
क्या जिन्दा-मुर्दा लाशों का ?
शान्ति-अमन का मार्ग छोड़,
निर्दोषों की बली चढाते,
अपनों को खोने वालों के,
आँसू के मोल चुकाओगे ?
कुछ भी हासिल कर न सकोगे,
बस दंगाई बन रह जाओगे ,
राज करोगे कब तक आखिर,
उन्मादों के हथियारों से |
विश्वास-प्रेम के बंधन का,
मोल अगर ना समझ सके,
लानत है इस पैदाइश की ,
तुलसी-कबीर की धरती पर |
क्या खोया उन लोगों ने,
जो जहाँ छोड़ कर चले गये,
तुम भी कवलित हो जाओगे,
खुद सर्वनाश अपना कर के |
तुम समझो तुम तो जीत गए,
वो समझें वो भी जीत गए ,
भूल गए हो आखिर दोनों,
ईश्वर- अल्लाह क्यों हार गए ?
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