Tuesday, 11 July 2017

सुरसा का अभयदान

सुरसा का अभयदान

-राय साहब पांडेय

लीला की 'राम चाहे लीला, लीला चाहे राम' और नाम से क्या काम | जी हाँ, नाम राम लीला, पर राम-लीला से कुछ काम नहीं | यह है आज की राम-लीला | पहले राम-लीला का स्वरूप कुछ और था, खासकर गांवों में इसका बेसब्री से इंतजार होता था | नवरात्र के पहले दिन से ही इसकी शुरुवात हो जाती थी | जो गाँव चंदे में अधिक धन एकत्रित कर लेते थे उनके यहाँ राम-लीला खेलने वाले पेशेवर लोग भाड़े पर आ जाते थे | अधिकांशतः कई गाँव के लोग मिलकर आपस में सहमति से अपने पात्रों का चुनाव करते थे और राम लीला आरम्भ हो उसके हफ़्ते-दस दिन पहले से ही अपनी-अपनी भूमिकाओं का पूर्वाभ्यास करते थे | बाकायदा कई रामायण इसके लिए टटोले जाते थे, लेकिन गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस ही मुख्य आधार होता था | कथा वाचक, रंगकर्मी पंडित राधेश्याम द्वारा रचित राधेश्याम रामायण भी आलाप एवं संवाद की दृष्टि से उपयोगी माना जाता था | हारमोनियम और ढोलक जैसे वाद्य यंत्रों का खूब प्रयोग होता था क्योंकि इसे बजाने वाले सरलता से उपलब्ध होते थे | कुछ व्यासजी लोग भी अपनी मर्जी से अपनी सेवाएँ समर्पित करते थे और सूत्रधार का कार्य भी करते थे | कौन सी चौपाई किस राग-धुन में गानी है, कहाँ कितना ज़ोर देना है, यह उन्हें बखूबी पता होता था | कुछ वाचक तो इतने पारंगत होते थे कि एक ही चौपाई को कई तरीकों से पेश कर सकते थे | राम-लीला देखने वालों का हुजूम जमा होता था | व्यासजी द्वारा गणेश वंदना प्रारंभ होती थी:


जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।

करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।


अर्थात् जिन्हें स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणों के स्वामी और सुंदर हाथी के मुख वाले हैं, वे ही बुद्धि के राशि और शुभ गुणों के धाम अर्थात श्री गणेशजी मुझ पर कृपा कर | और जैसे ही ढोलक और हारमोनियम के ताल के साथ दर्शकों ने यह चौपाई सुनी, उनके मध्य पूर्ण नीरवता छा जाती थी |


राम जन्म की कथा से प्रारंभ हो कर नारद मोह, मुनि विश्वामित्र का अयोध्या आगमन, राम विवाह होते हुए आज परशुराम-लक्ष्मण संवाद की कथा का मंचन होना था | सभी पात्र अपने-अपने अभिनय का अभ्यास कर रहे थे | यह कथा एकदम रोचक होनी चाहिए ऐसा पूरी टीम की अभिलाषा हुआ करती थी | राम हरख, राम दरश और राम किशुन क्रमशः राम, लक्ष्मण और परशुराम के भूमिका में उतरने वाले थे | पूर्वाभ्यास के दौरान ही व्यासजी के साथ पात्रों का संवाद होता था जिसमें उनकी कुछ शंकाओं का समाधान भी हो जाता था और पात्र को अपना किरदार अदा करने में मदद भी मिलती थी | इस तरह के प्रश्न अधिकतर राम दरश द्वारा ज्यादा किए जाते थे |


राम दरश ने पूछा, “व्यासजी, संवाद क्यों आवश्यक है?”


व्यासजी शायद इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अपने अनुभव के आधार पर कहने लगे, “तुम्हारे मन में यह जिज्ञासा उठना लाज़मी है क्योंकि तुम आज के संवाद के प्रमुख पात्र हो | देखो, संवाद कोई वाद-विवाद प्रतियोगिता नहीं है जिसमें प्रतिपक्ष के तर्कों का तर्क या कुतर्क द्वारा प्रत्युत्तर दिया जाए और दर्शकों से ढेर सारी तालियाँ हासिल की जाए | असल में संवाद किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए एक आवश्यक और स्थायी प्रक्रिया है | संवाद ही समाधान का एकमात्र नैतिक और अहिंसक अस्त्र है | हिंसा संवाद के लिए विष है और अफवाहें इस जहर को फैलाने का काम करती हैं | अफवाहों का उपयोग अनौपचारिक माध्यमों द्वारा अपने-अपने पक्षों को सुदृढ़ करने की कोशिश होती है या संवाद का माहौल खराब करने के लिए किया जाता है |”


व्यासजी अपने तर्कों को और आगे बढाते हुए कहने लगे | व्यास उवाच, “आज जो तुम अभिनय करने वाले हो दरअसल उसका भी यही मंतव्य है | श्री रामजी ने धनुष भंजन कर दिया है | सीताजी का विवाह तो स्वयंवर की प्रथा के अनुसार हो ही गया फिर भी राज-घरानों की परंपरा के अनुकूल वैदिक रीति से भी यह विवाह संपन्न होगा | परशुरामजी पधार चुके हैं | मान लो यह संवाद न होता और परुशुरामजी न आव देखते न ताव, तैश में आकर उपस्थित सभी राजाओं पर आक्रमण कर देते तो क्या होता ?”


व्यासजी यहीं नहीं रुके, “वस्तुतः संवाद अभिव्यक्ति से जुड़ा मसला है | या यूँ कहें कि इसके बिना जीवन ही संभव नहीं है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | बच्चा जब पैदा होता है तो पहली बार रोना ‘फर्स्ट क्राय’ ही उसके लिए टॉनिक है | यहीं से उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का आगाज़ होता है | आदरणीय तिलकजी ने ऐसे थोड़े ही कहा था ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ |”   


राम दरश व्यासजी से सार्थक उत्तर पा कर गदगद हो गए | शाम की राम-लीला में दर्शकों ने मुख्य मंच के सामने करीब बीस मीटर की दूरी पर रखे तख़्त पर परशुराम के खड़ाऊँ की दमदार पटकन देखी और कुछ के टूटने की आवाज भी सुनी | तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी | लक्ष्मण के पाठ पर पुरस्कारों की बौछार भी हो रही थी | सब मिलाकर आज की राम-लीला का आयोजन एक सफल आयोजन सिद्ध हुआ |


श्री राम का राज्याभिषेक, कैकेयी के कोपभवन जाने और राम वनवास से लेकर राम-लीला अब शूर्पनखा की नक-कटैया तक आ पहुँची | यह प्रसंग भी दर्शकों में बड़े उत्साह से देखा जाता है | दूसरा बड़ा प्रसंग लक्ष्मण को मेघनाद द्वारा अमोघ शक्ति से मूर्छित करने का होता है, जिसे इस टीम द्वारा बड़े ही मनोरम ढंग से पेश किया जाता है | यह लीला देखने के लिए तो घर की बहू-बेटियाँ भी आ जाती थीं |


राम दरश अपने गुरु और व्यासजी की तरफ पुनः मुखातिब हुए, “व्यासजी, क्या शूर्पनखा का नाक-कान काटना लक्ष्मण के लिए आवश्यक था? क्या कोई और उपाय नहीं हो सकता था?” वास्तव में उन्हें एक महिला की नाक काटना थोड़ा नागवार लग रहा था | व्यासजी थोड़े असमंजस में पड़ गए, क्योंकि उन्होंने ही तो संवाद पर अपनी बेबाक राय कुछ दिन पहले ही राखी थी | फिर भी संयमित होते हुए कहा, “देखो श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे | उन्हें यह लीला करनी थी | वे चाहते तो अवश्य कोई दूसरा उपाय हो सकता था |”


राम दरश की जिज्ञासा शांत नहीं हुई | उसने फिर पूछा, “गुरूजी क्या हमें इस बात को समझने के लिए कोई और तर्कसंगत सार नहीं ढूढ़ना चाहिए? क्या हमें इसे महज एक आस्था और विश्वास का विषय मान कर ज्यों का त्यों छोड़ देना चाहिए? और यदि हम ऐसा ही करते रहेंगे तो इसका दुरुपयोग नहीं हो सकता? इससे लोग प्रश्न करने पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं करेंगे? खासकर राजनीतिक हलकों में तो ऐसे विषयों को तोड़-मरोड़ कर परोसे जाएंगे और प्रश्न करने की आजादी भी नहीं मिलेगी | हो सकता है कि भविष्य में जनता से जरूरी मुद्दों पर से ध्यान भटकाने की चाल के रूप में इसका इस्तेमाल हो? इस तरह क्या हमारी सोच वैज्ञानिक बन सकेगी? सबसे बड़ी बात क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर आंच नहीं आएगी?” राम दरश आगे भी पूछने लगे, “क्या यह किसी स्त्री को, चाहे वह कितनी भी कपटी क्यों न हो, नासिका विहीन कर यूँ दर-बदर भटकने के लिए छोड़ देना चाहिए? क्या हम इसे मात्र कवि की कल्पनाशीलता समझ कर विषय को रोचक और रोमांचक बनाने की कला नहीं मान सकते?”


इतने प्रश्नों की झड़ी सुनकर व्यासजी हलके से मुस्कराए | “यह एक गूढ़ रहस्य भी तो हो सकता है | इस प्रश्न पर और चिंतन-मनन करना चाहिए |”


और शूर्पनखा की नाक कट गई | शूर्पनखा बना कलाकार एक हाथ से अपनी नासिका पकड़े दूसरे हाथ से लाल रंग का नकली खून दर्शकों, खासकर छोटे बच्चों पर छिड़कते हुए डरावनी आवाज निकाल रहा था | राम-लीला में माता सीता का रावण द्वारा हरने का मार्ग प्रशस्त हो गया | अगले दिन की राम-लीला के एलान के साथ महावीर हनुमान का प्रवेश हो गया | आज की राम-लीला समाप्त | बोलो- ‘जय हनुमान’ फिर भीड़ ने बोला- ‘जय श्री राम’ |


हनुमान का अभिनय करने के लिए एक मोटे-तगड़े कद-काठी वाले नवजवान को चुना गया था | चौपाई कहने का उसका अंदाज अलग था | भगवान श्री राम के सम्मुख विनय पूर्वक खड़े हो कर जब वह “को तुम श्यामल गौर शरीरा, क्षत्रिय रूप फिरहु बन बीरा.... ” और आगे की चौपाइयाँ गाता था तो जनता वाह-वाह कर उठती थी |


अब श्री राम जी का आशीर्वाद और माँ के लिए श्री राम की अंगूठी लेकर लंका के लिए प्रस्थान करना है परन्तु इसके पहले हनुमान जी को समुद्र भी तो लांघना है! इसे प्रस्तुत करने के लिए मुख्य मंच से लेकर सामने रखे तख़्त तक एक मोटी  रस्सी टांगी जाती थी और उस पर हनुमान जी की बांस की तीलियों और काग़ज से बनी  प्रतिमा पटाखे के साथ लटकाई जाती थी | पटाखे में आग लगाने के बाद यह काग़ज की मूर्ति आधा रास्ते तक पहुँच कर रुक जाती थी | यहाँ पर हनुमान जी का नाग माता सुरसा से राक्षसी रूप में साक्षात्कार होता है | दोनों में संवाद होता है और ज्यों-ज्यों सुरसा बदन बढ़ावा तास दुगुन कपि रूप दिखावा” | इसके बाद जब सुरसा का मुख विशाल हो जाता है तो हनुमान जी एकदम सूक्ष्म रूप धारण कर सुरसा के मुख में प्रवेश कर बहार निकल जाते हैं | हनुमान का बुद्धि-चातुर्य और बुद्धि तत्परता देख सुरसा नाग माता रूप में प्रकट हो कर अपने सत्कार्य में सफल होने का श्री हनुमान जी को आशीर्वाद और अभयदान प्रदान करती है | हनुमान जी जय श्री राम कहते हुए सामने वाले तख़्त पर पहुँच जाते हैं और साथ में पटाखे की आवाज के साथ वह लटकी मूर्ति भी |


यद्यपि हनुमान का अभिनय राम सनेही कर रहे थे लेकिन अभिनय के पहले ही राम दरश ने व्यास जी से इस अभयदान के बारे में जानने  की इच्छा व्यक्त की थी | राम दरश ने पूछा, “गुरूजी, क्या एक राक्षसी हनुमान सरीखे महाबली को अभयदान देने की क्षमता रखती है?”


श्री व्यासजी उवाच, “राम दरश तुम्हारा प्रश्न श्रेष्ठ है इसलिए नहीं कि अध्यात्म से जुड़ा है वरन इसलिए कि यह आम आदमी के रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ा है | अभय दान देने के लिए अपना पुण्य न्योछावर करना पड़ता है | सुरसा यदि राक्षसी रूप में यह वरदान देती तो संभवतः यह फलित न भी होता | वह भी ऐसे महाबली  को वरदान जिसे स्वयं भगवन राम का आशीष प्राप्त हो |”


व्यासजी अभय दान के विषय में आगे कहने लगे, “अभय दान ज़रूरी है भय मुक्त होने के लिए | चाहे वह भगवान राम की कृपा से हो या आज के समय में राजनीतिक संरक्षण से | शीर्ष पर बैठे राजनेता भी उन तमाम लुच्चों, लफंगों और माफियाओं को खुली छूट देते रहते हैं अपनी नेतागिरी की दुकान चलाने के लिए और एक बार उनका स्वार्थ सिद्ध हो गया तो दूध की मक्खी की भांति निकाल कर फेंक देने में देर भी नहीं लगती | अतः ऐसे अभय दान से बचना ही सर्वथा श्रेयस्कर है |”


व्यासजी यहीं नहीं रुके और अतिरिक्त प्रकाश डालते हुए बोले, “जिसके पास खोने को कुछ भी न हो, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि वह भय मुक्त हो जाएगा | पराजय का भय, संपत्ति खोने का भय, मान मर्यादा लुट जाने का भय निकृष्ट कर्मों में लिप्त होने  से रोकता अवश्य है | भय-अभय का संतुलन बनाए रखना बहुत कुछ मनुष्य के विवेक से ही निर्धारित हो सकता है | चाणक्य के अनुसार विवेकशील व्यक्ति से जीत पाना बहुत ही कठिन है | अविवेकी मनुष्य को मिला अभय दान धराशायी होगा ही होगा भले ही वह भगवान शिव द्वारा प्राप्त किया गया क्यों न हो | सुरसा नाग कन्या भी है, सुरसा राक्षसी भी बन सकती है | अगर अभय दान सुरसा के नाग कन्या रूप से प्राप्त होगा तो हितकारी होगा और यदि यही अभय राक्षसी रूप से मिला होगा तो इसका दुरुपयोग अवश्यंभावी है | वह अभय दान दे सकती है तो वह अभय दान छीन भी सकती है | अभय दान का उपयोग यदि सत्कर्मों के लिए होगा तो स्थायी होगा वरना जितनी तेज़ी से प्राप्त होता है उससे तीव्र गति से विनाश भी हो जाता है |”


राम दरश और राम सनेही व्यासजी के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके | घर लौटते हुए रास्ते में भी सोचते रहे कि आखिरकार रावण को भी तो भगवान शिव का वरदान प्राप्त था लेकिन फिर भी वह अभय नहीं दिला सका | उसका अविवेक ही उसके मद का कारण बन गया और सर्वनाश के गर्त में पतन का भी |

 

Monday, 10 July 2017

सूखते आँसू




सूखते आँसू
-राय साहब पांडेय

आँख दिखाने पर भी आँसू
आँख छिपाने पर भी आँसू,
चलते-फिरते, उठते-गिरते
बात-बात पर बहते आँसू |

माँ के गले लिपट कर आँसू
माँ से बिछुड़े तब भी आँसू,
भाई-बहन से चिढ़ कर रूठे
प्यार-दुलार में झरते आँसू |

 साथी साथ बिना भी आँसू
लड़ते यार से छलकें आँसू,
कब कट्टी, कब पक्की ?
खेल-खेल में बहते आँसू |

शिकवा में भी निकले आँसू
प्रेम-रोग बन जाते आँसू ,
मान-मनौव्वल मीत मनों में
छुपकर बहते मीठे आँसू |

आपस में जब खटपट होती
 मीठे स्वाद भी खारे लगते,
भूल के रिश्तों की कड़वाहट
पोंछे आँख के कोने आँसू |

घर-परिवार की अनबन देख
कुटिल जनों के तीर वार सुन,
समझ न आए कब क्या बोलें
मन ही मन दब जाते आँसू |

एक अकेले चल निकले थे
छूटा संग फिर हुए अकेले,
तानों की बौछार देख-सुन
घूँट-घूँट कर पीते आँसू |

हुआ सुस्त तन हाथ काँपता
शिथिल हो गईं ज्ञान इंद्रियाँ,
शिव चरणों में बैठ-बैठ कर
  सूख गए सब के सब आँसू |  

जाग्रत-सुप्त-सुषुप्त दशाएँ
काया-माया छोड़ सिधारे,
परिजन के कंधों पर अर्थी
  पंचतत्व में मिल गए आँसू |  

शोक सभा कर स्नेही जन
ऐबों का भी गुणगान करें ,
चलते-चलते भी बह निकले
  कुछ सच्चे कुछ झूठे आँसू |  
      

Thursday, 6 July 2017

लंगड़ी गली


लंगड़ी गली
-राय साहब पांडेय
नाम रखने का कोई खास कारण हो ऐसा हमेशा नहीं होता | हाँ कभी-कभी कुछ अभिज्ञ लोग नामों का विशेष ध्यान अवश्य रखते हैं | पर गलियों, मोहल्लों के विषय में कोई न कोई कारण या घटना अवश्य होती है | आजकल तो गलियों का नंबर होता है, नाम पर सड़कें जरूर होती हैं | पहले ऐसा नहीं होता था | कोई गली अगर पतली है तो उसका नाम पतली गली या संकरी गली पड़ना लाजमी है | इसी तरह किसी गली में यदि विशेष सामान बनता है या मिलता है तो उसका नाम उसी पर पड़ जाता है | मसलन कचौड़ी गली या सब्जी गली इत्यादि | पर अब आप अवश्य पूछेंगे कि यह लंगड़ी गली क्या है? क्या गलियाँ भी लंगड़ी होती हैं? या यहाँ लंगड़े लोग रहते हैं?

तब इस मोहल्ले में कुछ एक झोंपड़े ही थे | वास्तव में मोहल्ला कहना भी उपयुक्त नहीं होगा | सरकारी जमीन कहीं पर खाली पड़ी हो तो उसका या तो कोई माई-बाप नहीं होता या कोई भी जब चाहे उसपर कब्ज़ा जमा सकता है | यहाँ भी ऐसा ही हुआ था | पहले कुछ झोंपड़े बने फिर पुरुषों को कुछ मेहनत मजदूरी वाले काम धंधे भी मिलने लगे | महिलाओं को नजदीकी बस्तियों में झाड़ू-पोंछे का काम भी मिलने लगा | इनके नाते-रिश्ते वाले भी आ कर बसने लगे | धीरे-धीरे कुछ झोंपड़ियाँ एक बड़ी बस्ती में तबदील हो गईं | कुछ ले देकर सब के राशन कार्ड भी बन गए | देखते ही देखते पूरी बस्ती वोट बैंक के रूप में देखी जाने लगी | इस बस्ती में अब कुछ छुटभैये नेता भी पैदा हो गए | बिजली-पानी का इंतजाम भी हो गया | आखिर इंसानों की बस्ती थी, मानव अधिकारों की बात थी | कौन पूछता यहाँ बसने वाले लोग कौन हैं, कहाँ से आये हैं, जहाँ बसे हैं वह जमीन किसकी है | जिस रास्ते को पुरुष और महिलाएँ अपने काम पर जाने के लिए या शौच के लिए इस्तेमाल करते थे, उसके दूसरी तरफ भी बस्तियाँ बस गईं | हाँ, अब यह बस्ती एक पूरा मोहल्ला बन चुका है और सामने वाला रास्ता एक लम्बी गली | गली का बायाँ सिरा एक पतली सड़क से निकल कर दाहिनी ओर एक बड़े पीपल के पेड़ तक पहुँचता है | इस मोहल्ले का सारा क्रियाकलाप इसी गली के इर्दगिर्द चलता है | अब इस गली में हर सामान के लिए दुकानें खुल गई हैं | खाने-पीने से लेकर शादी-ब्याह तक का सभी जरूरत का सामान यहाँ उपलब्ध है |

जितनी तेजी से इस मोहल्ले का विस्तार हुआ उतनी ही तेजी से ही यहाँ की आबादी भी बढ़ी | छोटे बच्चों की तो मानो बाढ़ ही आ गई हो | आठ-दस घरों को मिलाने से ही पूरी क्रिकेट की एक टीम तैयार और साथ में अतिरिक्त खिलाड़ी भी | लेकिन यहाँ बच्चे क्रिकेट नहीं बल्कि ईंट और नरिया के छोटे–छोटे  टुकड़ों से खेलते थे जिन्हें वे कब्बा खेल कहते थे | इसमें बच्चों को एक पाँव को बिना जमीन पर रखे दूसरे पाँव से उछड़-उछड़ कर बिना गिरे इन टुकड़ों को एक के ऊपर एक लगाना होता था | अकसर बच्चे इस गली में अनेक जगहों पर कब्बा खेलते हुए दिखाई देते थे | बच्चों की भचकन देख कर ही इस गली का नाम लंगड़ी गली पड़ गया |   

लंगड़ी गली अब पूरी तरह आबाद है | सड़क से नीचे उतरते ही दायें हाथ की पटरी पर रहमत मियाँ की एक छोटी सी दुकान है | दुकान के पीछे वाले भाग का इस्तेमाल परिवार को रहने के लिए है | दुकान से गुजरते ही मियाँ की राम-राम सुने वगैर आप दुकान में कदम नहीं रख सकते | तकरीबन पैंसठ के होंगे पर अभी भी उनका पाँव गज़ब की फुर्त्ती से चल रहा है | नज़र ऊपर उठाने की फुरसत नहीं है | लगन-बारात का सीजन जो चल रहा है! समय से सिलकर कपड़े नहीं दिए तो इनकी क्या साख रह जाएगी? आज तक किसी को निराश नहीं किया | तय शुदा वक्त से पहले ही कपड़े तैयार मिलेंगे | उनका वसूल है, वादा किया है तो निभाऊंगा भी | वे अकसर गुनगुनाते रहते हैं:
अपने रहमत पे रहम कर
कभी रुसवा न कर देना,
मेरी गफलतों की सज़ा मेरे
 अज़ीज़ असामी को न देना |

समय के पाबंद रहमत अली अपने काम में इस कदर मशगूल रहते हैं कि जुमे की नमाज़ भी अपनी दुकान में ही अदा कर लिया करते हैं | हुनर और लगन के पक्के जज़्बाती इंसान को अपने काम की धुन सवार रहती है | काम और क़र्ज़ को शत्रु मानते हैं | किसी ने उन्हें सिलाई के पैसे के लिए कभी भी किसी से हुज्जत करते नहीं सुना | अकसर इस गली से नाच-बाजे के साथ महिलाओं का हुजूम निकलता हुआ गली के दूसरे सिरे को पार कर विशाल पीपल के पेड़ तक जाता है | छोटी उम्र की लड़कियों और सुहागिनों के सर पर थाल-परात में तरतीब से सज़ा कर रखे दुल्हन के कपड़े और गहने जाते देख रहमत मियाँ एकदम बाग़-बाग़ हो उठते हैं |क्यों न हों, आखिर इन्होंने ही तो ये कपड़े सिले हैं | रहमत को लगता है कि इनकी मेहनत सफल हो गई |

बजनियों के थाप पर नाचती-गाती महिलाएँ पीपल के पेड़ तक पहुँच कर अपने रश्म -रिवाज के मुताबिक पूजा-अर्चना करती हैं | घर की कोई बुजुर्ग महिला या दूल्हे की माँ पीपल के मोटे तने के चारों ओर रक्षा के धागे से एक सौ एक बार परिक्रमा कर धागे में गाँठ लगाती है | ऐसा करते वक्त वह अपने इष्ट देवता और कुल देवता को मनाती रहती है, जिससे आने वाला समय घर के लिए खुशहाली भरा हो | तने के नीचे रखे पुरानी ईंट की भी पूजा की जाती है | आस-पड़ोस के छोटे बच्चे बिना बुलाए ही शामिल हो जाते हैं | उन्हें उम्मीद होती है कि पूजा के अंत में रेवड़ी, लाई और बतासा (ख़ालिस शक्कर की बनी एक तरह की मिठाई) तो मिलना ही है | रेवड़ियाँ बटें इसके पहले ही रहमत मियाँ दुल्हे का जोड़ा-जामा ले कर हाज़िर रहते हैं | घर की मालकिन को अपने हाथों से सुपुर्द कर एक कोने में बिल्कुल निर्विकार भाव से खड़े हो जाते हैं | जोड़े-जामे को उन ताज़ी टिकी हुई देव-ईटों को समर्पित किया जाता है | यही वस्त्र दूल्हा पहनता है और तब बारात निकलती है | फिर रहमत की बारी आती है | मालकिन दिल खोल कर नेग देती हैं | गले में कपड़े का टेप लटकाए, सर पर झीनी सफ़ेद गोल टोपी पहने रहमत उस नेग को सर झुका कर क़बूल करते और क्या मिला क्या नहीं उसे बिना देखे अपनी शेरवानी की जेब के हवाले कर वहाँ से चल पड़ते हैं | अब इन रिवाजों में खासी कमी आ गई है फिर भी रिवाज ख़त्म होने में एक-दो पीढ़ियाँ तो गुजर ही जाती हैं |

रहमत की दिनचर्या और सादगी भरी जिंदगी देखकर यकीन नहीं होता कि ऐसा इंसान सचमुच आपके बीच मौजूद है | सब कुछ ऊपर वाले के हवाले | मन-कर्म-वचन से समर्पण का भाव | ‘तेरा तुझको अर्पण’ को पूरी तरह चरितार्थ करने वाले | थोड़ी देर उनसे बात करिए फिर अपनी तबीयत टटोलिए | आप देखेंगे कि आपका मन पूरी तरह हल्का हो गया | जब कोई पंडितजी उनसे कहते कि अरे मियाँ अमुक-अमुक बात तो हमारे उपनिषदों में लिखी है आपको कैसे पता? आपको इन ग्रंथों को न तो पढ़ने की आवश्यकता है और न ही काबिलीयत | रहमत बिलकुल नाराज़ नहीं होते | नरम आवाज़ में उत्तर देते हैं- जरूरत तो है पंडितजी, भला ज्ञान की किसको जरूरत नहीं होगी? हाँ, काबिलीयत वाली बात आपने सही फरमाई | इसका मुझे अफ़सोस है कि मेरी तालीम बराबर नहीं हुई | फिर थोड़ा गंभीर होते हुए कहने लगते हैं, “पंडितजी, दुनिया में हर किसी को इंसानियत और हैवानियत में अंतर पता होता है | भले लोग इसे आसानी से मानते हैं और कुछ लोग मानते हुए भी इसे स्वीकार नहीं करते | इंसान का इंसान से भाई चारा ही सबसे बड़ा धर्म है | इसी में सारा सुख निहित है |” पंडितजी सहमति में सर हिलाते और अपने काम पर चल देते |

लंगड़ी गली में अब कब्बा खेलने वाले बच्चों का अकाल पड़ गया है | कब्बा की जगह अब क्रिकेट ने ले ली है | क्रिकेट की बॉल कभी-कभी रहमत मियाँ के घर में भी चली जाती है | बच्चे चिल्लाते हैं, चचा बॉल और किसी जवाब की इंतजार किए वगैर घर में घुस कर बॉल ले कर आ जाते हैं | आखिर अभी घर में है भी कौन?

बचपन में इस गली से मेरा आना-जाना होता रहता था | तब मैं रहमत अली से वाक़िफ़ नहीं था | बहुत समय तक बाहर रहने के कारण लोग भी आपको आपके नाम से नहीं आपके बाप-दादा के नाम से ही पहचानते हैं | बाहर रहने के बावजूद भी अपने गाँव, मोहल्लों और देश के विषय में जानने की उत्सुकता भला किसे नहीं होती? बच्चों के इस कदर बिना रोक-टोक किसी के घर में घुसना मुझे अजीब सा लगा | जब भी मैं उधर से गुजरता यही नज़ारा देखने को मिलता | मन में जानने का कुतूहल तो होता था, पर किसी न किसी वजह से आगे बढ़ जाता था और मन में दबी उत्सुकता दबी ही रह जाती थी | पर आज ऐसा नहीं हुआ | जैसे ही मैं रहमत अली की दुकान के सामने से गुजरा मैंने ‘राम-राम रहमत चचा’ ठोक ही दिया | उन्होंने सिलाई मशीन से सर ऊपर उठाते हुए मेरी तरफ देखा | उनका चश्मा नाक पर और आँखें नीची सीधी मेरे चेहरे पर | “राम-राम मियाँ, सब खैरियत तो है”, इस अंदाज में कहा जैसे मुझे बरसों से पहचानते हों | मैं पत्थर की दो सीढ़ियाँ चढ़ कर उनकी मशीन के ठीक सामने खड़ा था | “तशरीफ़ रखिए जनाब कहिए कैसे आना हुआ, क्या खिदमत करूँ”, बड़ी ही शालीनता एवं अदब के साथ पूछा | मैं क्या बोलता? फिर भी गोल मोल जवाब देने के बजाय मैंने कहा, “चचा इधर से मैं जब भी गुजरता हूँ आप की गर्दन हमेशा सिलाई मशीन पर ही टिकी रहती है और आप कुछ बुदबुदाते रहते हैं, इसीलिए सोचा आपसे कुछ बात करूँ | अगर आपको कोई एतराज न हो तो |” “क्या बात करते हो, आप कुछ नए लग रहे हो, माफ़ करना मैं आपको पहचाना नहीं”, बड़े ही ज़िंदादिली से पूछा | उनके सामने रखे स्टूल पर बैठते हुए मैंने कहा, “अरे चचा कैसे पहचानेंगे, मैं तो तमाम सालों से इधर रहता ही नहीं था | अब फिर वापस आया हूँ | सड़क के उस पार मेरा घर है मेरे पिताजी को आप अच्छी तरह जानते हैं | बचपन में मैं इस गली में खेलने आया करता था |” मेरे पिताजी का नाम सुनते ही बड़े ही प्यार से मेरी तरफ मुखातिब हुए, “उन्हें कौन नहीं जानता, बड़े ही नेक और दरियादिल इंसान थे | खुदा को भी ऐसे बन्दों को ऊपर बुलाने की जल्दी रहती है | अभी घर परिवार कैसा चल रहा है?” “सब खैरियत है आप जैसे नेक बन्दों की दुआ से”, बात आगे बढ़ाते मैंने कहा | फिर इस गली के कुछ अपने पुराने साथियों करीमू, लल्लन और तुलसी का नाम लिया और उनके बारे में जानने की इच्छा जाहिर की | करीमू और लल्लन का नाम मेरी जबान से सुनते ही वे एकदम बुत हो गए और पता नहीं ऊपर देख कर कुछ बुदबुदाने लगे | मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैंने ऐसा क्या पूछ लिया | काफी देर तक जब वे चुप रहे तो मैं चुप्पी तोड़ते हुए बोला, “चचा क्या हुआ आप बिलकुल खामोश क्यों हैं? माफ़ करिएगा अगर आप नहीं बताना चाहते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन आप इस तरह मौन न हों |”

मेरी बात सुनकर उनको शायद यकीन हो गया कि मैं सचमुच इनके बारे में कुछ नहीं जानता | रहमत अली की आँखों में आँसू देख मेरी बेचैनी और बढ़ने लगी | रुँधे गले और डबडबाई आँखों को देख कर मुझे समझने में देर नहीं लगी कि इनके साथ कुछ भयानक अप्रत्याशित घटना अवश्य घटी होगी | थोड़ी देर बाद रहमत अली थोड़े शांत हुए और यह जानकार कि मैं उनका दोस्त हूँ, पूरे घटनाक्रम को कुछ इस तरह बताने लगे |

मैं और करीमू की माँ अपने गाँव गए हुए थे | यहाँ करीमू अकेले ही था | करीमू, लल्लन और तुलसी तीनों हम उमर थे | एक साथ इसी गली में खेले, बड़े हुए और थोड़ी बहुत पढ़ाई भी की | करीमू शहर में एक कपड़े की दुकान पर और लल्लन एक दवा की दुकान पर लग गए थे | तुलसी शहर में ही बढ़ई का काम करने लगा था | कारीमू और लल्लन दोनों एक साथ बस में शहर जाते थे और अकसर एक साथ ही लौटते भी थे | एक दिन दोनों बस में एक साथ ही बैठे थे | बस में भीड़ बहुत थी | रास्ते में कुछ लड़के बस में चढ़े और धक्का-मुक्की करने लगे | कभी एक के ऊपर तो कभी दूसरे के ऊपर गिर रहे थे | मना करने पर भी नहीं मान रहे थे | फिर गाली-गलौज पर उतारू हो गए | बाद में जब लल्लन से कुछ कहासुनी हो गई तो कारीमू ने बीच-बचाव की कोशिश की | इस पर वे सब और भड़क गए और बाद में देख लेने की धमकी देकर रास्ते में ही उतर गए | बच्चों ने सोचा बात आई गई हो गई |

रात में करीब साढ़े दस बजे का समय था | ठंढी के मौसम में दिन वैसे ही छोटा हो जाता है, लोग जल्दी ही खा-पीकर सो जाते हैं | दस लड़कों का झुंड आया और जोर-जोर से दुकान का दरवाजा पीटने लगे | करीमू क्या करता, दरवाजा खोल दिया | सारे के सारे एक साथ उस पर टूट पड़े | उनके हाथों में लाठियाँ थी | किसी तरह जान बचा कर भागने के अलावा और कोई सूरत नहीं दिखी | वह सामने वाले घर में भागा जिसमें लल्लन रहता था | अँधेरे में कोई किसी को देख नहीं पा रहा था | करीमू की आवाज पहचान कर उसने जैसे ही दरवाजा खोला सभी उसके ऊपर भी टूट पड़े | लाठी किसको पड़ रही है, कहाँ पड़ रही है कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था | लल्लन और करीमू दोनों निढाल गिर पड़े | जब तक शोर-शराबा सुन कर गली वाले इकट्ठा होते, सभी आतताई रफूचक्कर हो गए थे | पड़ोसियों ने हिम्मत दिखाई | लाद-फान कर किसी तरह अस्पताल पहुँचाया | डाक्टरों की लाख कोशिश के बावजूद लल्लन नहीं बच पाया | करीमू बच तो गया पर उसकी एक टाँग काटनी पड़ी |

ऐसा कहते-कहते रहमत मियाँ चुप हो गए | थोड़ी देर बाद अपने आँसुओं को पोंछते हुए ऊपर देखा और धीरे से कहा, “अल्ला की मर्जी के आगे किसका बस चलता है | इस हादसे के बाद करीमू की अम्मी जान बुरी तरह टूट गईं और अकसर बीमार रहने लगीं | अभी पिछले साल उनका भी इंतकाल हो गया | लल्लन के वालिद भी इस गली को छोड़ कर शहर में अपनी बेटी के साथ रहते हैं |” मैंने बड़ी मुश्किल से पूछा, “करीमू अब कहाँ है, आप उसके साथ क्यों नहीं हैं?” यह सुनते ही रहमत के चेहरे  से मानो गम की छाया काफ़ूर हो गई |

एक लम्बी सांस लेते हुए उन्होंने गंभीर सवाल दाग दिए, “आतताइयों का कोई ईमान-धरम नहीं होता | ये कहीं भी विश्व के किसी कोने में किसी भी वेष में आपको मिल जाएंगे | मजहब के नाम पर अपने स्वार्थ साधने में इन्हें कोई गुरेज नहीं होता | अगर कोई इनके स्वार्थ सिद्धि में रोड़ा बनता है तो इन्हें हैवान बनने में देर नहीं लगती | मेरा बेटा भी अब शहर में ही रहता है | उसके मालिक नेक इंसान हैं, उन्होंने उसे उसी तरह नौकरी पर रख लिया जैसे वह पहले करता था | मैं इंसानियत में यकीन करता हूँ और सिवा खुदा के किसी से खौफ़ नहीं खाता | मैं ताउम्र यहीं रहूँगा |” मैं आगे क्या कहता सुनता | हाथ जोड़े, बंदगी की और धीरे से उठ खड़ा हुआ |  

बाकी रास्ते में मुझे कुछ नहीं दिखाई दिया | मैं सोचता रहा, “गलियाँ न तो लंगड़ी होती हैं और न ही अंधी या बहरी | यह तो इंसान के स्वभाव में है कि एक सही सलामत इंसान को लंगड़ा, अंधा या बहरा बना दे और अपने हैवान होने का परिचय दे | इंसान तो वह है जो यह सोच कर दिया जलाता है कि इसकी रोशनी दूर तक फैलेगी और खुद रोशन हो या न हो परंतु राहगीर इस रोशनी में अपना रास्ता ढूँढ अवश्य ले |”

कौन कहता है आज के ज़माने में इंसानियत नाम की चीज नहीं रह गई है? जब तक रहमत अली जैसे इंसान जिंदा हैं, इंसानियत कभी मर नहीं सकती |  

Monday, 3 July 2017

मासूमियत -कौन है जो बच पाएगा ?



मासूमियत
-राय साहब पांडेय
मुस्कान हो या हो रुदन
जागृत हो या हो शयन
चंचल हो या हो शिथिल
शिशु की भोली सूरत से
 कौन है जो बच पाएगा ?

आँख की भाषा पढ़नी हो
 कर्कश हो या कोमल हो
 मन की बात बूझनी हो
शिशु की भोली हरकत से  
कौन है जो बच पाएगा ?

अक्ल से क्या है लेना-देना
समझ-बूझ ना जादू-टोना
मन निश्छल तन सोना
शिशु की प्यारी बोली से  
कौन है जो बच पाएगा ?

रुकने चलने का बोध नहीं
गिरने उठने का क्षोभ नहीं
बाहर हो या घर का कोना
शिशु की डगमग चालों से  
कौन है जो बच पाएगा ?

हानि-लाभ का भेद नहीं  
अलगाव-पास का चेत नहीं
पल में हँसना पल में रोना
शिशु के इन क्रियाकलापों से  
कौन है जो बच पाएगा ?

सुख-दुःख की मोह न माया
ना चाहे क्षत्र न कोई छाया
सब अपना ना कोई पराया
शिशु की सहज किलकारी से  
कौन है जो बच पाएगा ?

बचपन जीवन का संतोष
सम्यक होता ज्ञान बोध
कर लो चाहे जितना शोध
शिशु की मासूम झोली से
कौन है जो बच पाएगा ?