Friday, 23 November 2018

बोल बम


बोल बम
प्राचीन काल से ही मनुष्य अपनी रोजी-रोटी के लिए अपने ठिकानों को बदलता रहा है | खुद को नए माहौल में ढालने तथा स्थानीय लोगों द्वारा स्वीकार किए जाने के बीच जद्दोजहद चलती रहती है | वह अपनी परम्पराओं और त्योहारों के साथ बेमेल समझौता भी करता है | समय के साथ कुछ सीखता है, कुछ सिखाता है और फिर वहीँ का हो जाता है | परंपरा और त्यौहार भी मनुष्यों के साथ चलायमान होते हैं |
सावन मास के आते ही शिव भक्तों में विशेष उत्साह संचरित हो जाता है | जगह-जगह शिव मंदिरों में लम्बी कतारें नजर आने लगती हैं | बम-बम भोले एवं हर-हर महादेव के जयघोष से शिवालय गुंजायमान हो जाते हैं | मटरू के लिए भी सावन का महीना किसी वार्षिक त्यौहार से कम नहीं है | शिव भगवान के लिए जलाभिषेक करना उनकी परंपरा का अटूट हिस्सा है | आज मटरू एक कावड़िया के रूप में पवित्र नदी के जल के साथ भगवान शिव का अभिषेक करने को उत्सुक हैं | परम्पराओं का निर्वहन करते हुए सुदूर असम के शिवसागर कसबे में भी कावड़ियों की चहल-पहल है |  कावड़ियों  के लिए कांवड़ यात्रा एक वार्षिक तीर्थ यात्रा है जिसमे शिव भक्त हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थानों, यथा उत्तराखंड में हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री तथा बिहार में सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल भर कर सैकड़ो किलोमीटर दूर स्थित शिवालयों में श्रद्धालु एकत्र होते हैं और अपने आराध्य को अर्पित करते हैं | मेरठ में पुरा महादेव तथा औघढ़नाथ, वाराणसी में काशी विश्वनाथ एवं झारखण्ड में बैजनाथ और देवघर आदि कुछ प्रमुख शिव मंदिर हैं,  जहाँ लाखों कावड़ियों की भीड़ एकत्र होती है |

कांवड़ यात्रा में कावड़िया एक बांस के डंडे के दोनों सिरों से लटके हुए लगभग दो बराबर मटकों में भरे पवित्र जल को अपने एक कंधे पर या दोनों कंधों पर संभाल कर चलता है | कांवड़ शब्द मूलतः संस्कृत के कावाँरथी (कांवर ले कर चलने वाला) शब्द से ब्युत्पन्न हुआ है, जिसमे अनेक कावड़िया एक साथ जुलूस के रूप में यह तीर्थ यात्रा निष्पादित करते हैं | पुराणों के अनुसार इस यात्रा का सम्बन्ध क्षीरसागर मंथन से माना जाता है | जब मंथन से निकले विष की ऊष्मा से संपूर्ण विश्व जलने लगा तब महादेव ने विषपान कर विश्व को इसके प्रभाव से बचाया परंतु स्वयं इसकी नकारात्मक उर्जा से बच नहीं सके | विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने तप करने के उपरान्त कांवड़ में जल लाकर पुरा महादेव में शिवजी का जलाभिषेक किया | इसके बाद शिव जी विष के प्रभाव से मुक्त हुए | ऐसा माना जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई | दूसरी मान्यता के अनुसार भगवान राम पहले कांवड़िया थे | कहते हैं कि श्री राम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था | कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित 'पुरा महादेव' का जलाभिषेक किया था | वह शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाए थे | इस कथा के अनुसार आज भी लोग गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक करते हैं | अब गढ़मुक्तेश्वर को ब्रजघाट के नाम से जाना जाने लगा है | एक अन्य किवदंती के अनुसार श्रवण कुमार ने त्रेता युग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत अपने दृष्टिहीन माता-पिता की गंगा जल से स्नान की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए की थी |


प्रारंभ में यह यात्रा काफी छोटे स्तरों पर आयोजित होती थी और मुख्यतः भारत के उत्तरी भूभागों में ही सम्पादित होती थी | जिस प्रकार छठ का आयोजन बिहार एवं पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों तक ही सीमित था और पलायन के चलते अन्य क्षेत्रों में भी इसका प्रचार-प्रसार खूब  बढ़ा तथा बाद में राजनीतिक रूप भी लेने लगा, उसी तरह कांवड़ यात्रा भी देश के अन्य भागों में भी खूब प्रचारित हो रहा है | अंग्रेज सैलानियों के अनुसार उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में कांवड़ तीर्थ यात्री उत्तरी भारत के मैदानी हिस्सों में देखे जाते थे | शुरुआत में वृद्धों एवं कुछ साधू-महात्माओं द्वारा ही इस यात्रा का विवरण मिलता है, परंतु पिछली सदी के आठवें दशक से तीर्थ यात्रियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और इस यात्रा पर भी राजनीतिज्ञों की नज़र पड़ चुकी है | अब यह यात्रा उत्तर के कुछ मैदानी भागों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छतीसगढ़, हरि- याणा, दिल्ली, पंजाब राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं असम प्रदेश तक फ़ैल चुकी है | 

कावड़ियों की मदद के लिए अनेक गैर-सरकारी संगठन अस्तित्व में आ गए हैं जो इन यात्रियों को मुफ्त सेवा प्रदान करते हैं तथा रास्ते में इनके लिए मुफ्त खान-पान, शयन-विश्राम और चिकित्सा संबंधी सेवाएं मुहैया करवाते हैं | ऐसा नज़ारा उत्तरी गुजरात में अम्बाजी के दर्शन हेतु यात्रियों के लिए आम हुआ करता है जिसमे तीर्थ यात्री नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा करते हैं | कावड़ियों में अधिकतर पुरुष होते है पर अब महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है |

आज सोमवार है | मटरू आज के दिन हमेशा केसरिया से देवघर अपनी मण्डली के साथ जाते थे | केसरिया निवासी केसरिया बाना में सुलतानगंज से पवित्र गंगाजल भगवन बैजनाथ को चढाते थे | आज वे अत्यंत भावुक हैं | अपने साथियों के साथ पुरानी यादें ताज़ा कर रहे हैं | दिखू का जल कांवड़ में भर कर शिव मंदिर में चढ़ाने के लिए अपने अपने कांवड़ संभालते आगे बढ़ रहे थे और शिव की महिमा में उद्घोष कर रहे थे:
बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है |
मटरू सबसे पहले बोलते: बोल बम का नारा है | इसके पीछे सभी बोलते :बाबा एक सहारा है  |

जो भी हो, मटरू जहाँ भी हैं पूरी श्रद्धा से भोले नाथ का अभिषेक तो कर ही रहे हैं | समय के साथ कावड़ियों की परंपरा में भी बदलाव दिखाई दे रहा है | जहाँ पहले ये कावड़िया भोला यानी निष्कपट, सीधा-सादा और दुनियादारी से बेखबर भक्ति के वशीभूत हो कर तीर्थ यात्रा संपन्न करते थे वहीँ आज इन कावड़ियों के मध्य शरारती तत्वों और पाखंडियों की भरमार हो गई है | आज कावड़िया ज्यादातर ऐसे युवा हैं जो किसी काम-काज में नहीं लग पाए हैं और आर्थिक विकास के अवसर में पीछे रह गए हैं | इनके लिए इस यात्रा का मकसद साफ़ नहीं है बस समाज में दिखावे के लिए भागीदार हो जाते हैं | आए दिन गाड़ियों में और सड़कों पर इनका उपद्रव इसी मानसिकता को दर्शाता है |




Thursday, 15 November 2018

नामघर




       नामघर: मटरू का भजन-कीर्तन

-राय साहब पाण्डेय
मटरू अब शिवसागर में रम गए थे | उनकी अपनी मंडली बन गई थी | ट्रेन के सहयात्रियों से उनकी दोस्ती प्रगाढ़ हो रही थी | साथियों के सहयोग से ही आज उनके पास अपना एक सायकिल रिक्शा हो गया था और वे भी दो पैसा कमा कर गाँव में रह रहे अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रहे थे | उनकी चिट्ठी-पत्री भी दोस्तों के पते पर आती थी | धीरे-धीरे स्थानीय परम्पराओं से भी वाकिफ़ हो रहे थे | भजन-कीर्तन में रुचि होने के कारण दोस्तों में उनकी लोकप्रियता बढ़ गई थी | अक्सर रविवार शाम मंडली की बैठक होती थी | कभी गोस्वामी तुलसी रचित रामचरितमानस का सस्वर पाठ तो कभी चैतन्य महाप्रभू के भजनों का संकीर्तन या फिर कबीर के निर्गुन इन बैठकों में सुनाई पड़ता था | ऐसी ही एक भजन संध्या में मटरू की मुलाकात एक भद्र जन से हो गई | इन महाशय का नाम काली प्रसाद शर्मा था | मटरू का भक्ति-भाव और स्वर का मधुर लालित्य देख-सुनकर काफी प्रभावित हुए | शर्माजी ने पूरी मंडली को नामघर में संकीर्तन के लिए निमंत्रित किया |  

नामघर मूलतः एक प्रार्थना सभागार होता है | नाम का अर्थ है प्रार्थना | पंद्रहवीं सदी के भक्ति आंदोलन के समय के असमिया भाषा के एक प्रसिद्ध कवि, नाटककार तथा वैष्णव समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव ने ‘एक शरण धर्म’  की स्थापना की | इस धर्म को 'नववैष्णव धर्म' या 'महापुरुषीय धर्म' के नाम से भी जाना जाता है | यह हिन्दू या सनातन धर्म से भिन्न नहीं है बल्कि उसी का एक पंथ है, जिसमे मूर्तिपूजा की प्रधानता न होकर श्रवण-कीर्तन को विशेष महत्व दिया जाता है | इस पंथ के अधिकांश अनुयायी असम प्रदेश के उजिनी (ऊपरी) तथा नोमिनी (निचले) दोनों क्षेत्रों में निवास करते हैं | इस सम्प्रदाय का मूल मंत्र है: एक देव, एक सेव, एक बिने नाइ केव | इस धर्म में कोई जाति-भेद ऊँच-नीच, धनी-दुखिया का भेद नहीं है | धार्मिक उत्सवों के समय केवल एक पवित्र ग्रंथ चौकी पर रख दिया जाता है, इसे ही नैवेद्य तथा भक्ति निवेदित की जाती है। इस संप्रदाय में दीक्षा की व्यवस्था नहीं है |
  
अठारहवीं सदी पूर्व असम में वैष्णव लोग धार्मिक कार्यों के लिए कोई स्थायी निर्माण नहीं करते थे | पत्थरों या ईंटो का कोई इस्तेमाल नहीं होता था | नामघर मुख्यतः बांस और लकड़ियों से निर्मित होते थे और उनकी छत घास-फूस की बनी होती थी | शायद ऐसा इसलिए होता था कि इस पंथ के प्रचारक एक स्थान पर अधिक दिनों तक रुकते नहीं थे, और ऐसी मान्यता थी कि कोई भी कक्ष जो यती और उसके शिष्यों को बैठने के लिए पर्याप्त हो, प्रार्थना के लिए भी पर्याप्त है | समय के साथ कीर्तन-घर, चाहे जिस भी स्वरूप में हो, नामघर के नाम से जाना जाने लगा | बीसवीं सदी आते-आते नामघरों के बनावट में भी बदलाव हुए और अब बांस के खम्भे कंक्रीट तथा फूस की छतें नालीनुमा टिन की चद्दरों से बनाने लगीं | यद्यपि इस पंथ में मूर्ति पूजा नहीं होती तथापि नामघरों में वैष्णवों के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखी जाने लगीं |

आज मेलाचक्कर नामघर में मटरू की मंडली का संकीर्तन आयोजित था | काली प्रसाद शर्माजी और आस-पास के लोग पहले से पहले से ही पंक्तिबद्ध बैठे थे | नामघर के बीचो-बीच पश्चिमी दीवाल से सटा हुआ काष्ठ निर्मित, कच्छपों, गजों और शेरों की कलाकृतियों से अलंकृत, सात-स्तरीय त्रिकोणीय गुरु आसन रखा था | इस आसन पर ही पवित्र ग्रन्थ की स्थापित था | नामघर में भक्तजन उत्तर और दक्षिण दिशा में एक दूसरे के सम्मुख बैठे थे | उत्तर और दक्षिण समूहों के मध्य का क्षेत्र अति पवित्र होता है और साफ़-सफाई के अतिरिक्त कभी भी कोई इस जगह पर कदम नहीं रखता | प्रार्थना की शुरुवात ‘नाम लोगुवा’ द्वारा की जाती है, जो स्वयं गुरु आसन के सम्मुख मध्य-क्षेत्र के अंत में बैठा होता है |

प्रार्थना समाप्त हुई | नाम लोगुवा’ की जगह मटरू और राम अगर्दी ने ले ली | अगल-बगल उनकी मंडली के सदस्य झाँझ-मजीरे, ढोलक और हारमोनियम के साथ अपने-अपने स्थान पर आसीन हो गए | नामघर के अन्य पदाधिकारी गण जैसे मेहदी, बुजंदार, नामघरिया और बिलोनिया इत्यादि लोग भी उपस्थित थे | मटरू और उनकी टीम ने आलाप लेना शुरू किया और जैसे ही मधुर स्वर में सरस्वती वंदना ‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला.......’ प्रारंभ किया, श्रोतागण मंत्र-मुग्ध हो गए | तत्पश्चात मटरू ने फिर नाम कीर्तन की तरफ रुख किया:
‘निज दास करि हरि मोके किना किना
अन्य धन न लागे नाम धन बिना’
‘अन्य देवी-देवता न करिबा सेवा, न खइबा प्रसाद तारा,
मूर्तिका न शइबा गृहो न पसिबा, भक्ति हैबे व्यभिचारा’

लगता है मटरू और उनकी टीम ने आज के लिए नाम-कीर्तन की पूरी किताब ही रख ली थी और लगन से पूर्वाभ्यास भी किया था | मटरू ने पयारा, झूना, लघु पयारा, दुलारी तथा शबी इत्यादि नाम कीर्तनों को एक-एक कर प्रस्तुत किया:
नमो गोप रुपी मेघासम स्यामा तनु |
गावे पीतवस्त्र हाथे सिंगा वेता वेनु ||
पीत वस्त्र सोभे श्यामला काया |
ताड़ीता जड़ता जलदा प्रया ||
सुन्दरा हसिकाका अल्प हसा |
चारू स्यामा तनु पिताबसा ||
अंत में मटरू ने नाम कीर्तन का समापन श्री कृष्ण स्तुति से की:
कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च |
नंदगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ||
नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने |
नमः पंकजनेत्राय नमः पंकजाङ्घ्रये ।।
वसुदेवसुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् |
देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्||
                हरि राम राम ||
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं |
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्
||
मटरू ने अपना भजन-कीर्तन समाप्त करते हुए  हाथ जोड़ कर सबका अभिवादन किया | सबने मुक्त कंठ से मटरू और उनके मण्डली की सराहना की |

अब काली प्रसादजी उठे और नाम-कीर्तन का महत्व समझाते हुए बोले, “जिस तरह श्रीमंत शंकरदेवजी ने ‘एक शरण धर्म’’ के दार्शनिक सिद्धांत को सरल रूप में लोगों तक सीधे उनके ह्रदय तक पहुँचाया वह भारत वर्ष के इस भूभाग का एक बेहतरीन धार्मिक आंदोलन है | यह पंथ न केवल मूर्तिपूजा के बल्कि भारी-भरकम एवं डरावने रश्म-रिवाजों में अनावश्यक अपव्यय के विरुद्ध भी था | उन्होंने ज्ञान एवं कर्म मार्ग के जटिल रास्ते से उबार कर अनपढ़ एवं गरीब लोगों को भक्ति मार्ग में प्रवेश करा कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कराया” | अंत में शर्मजी ने शंकरदेव जी के महानतम शिष्य माधवदेव की एक कथा सुनाई कि किस प्रकार श्रीमंत ने एक व्यापारी माधव को अपनी माँ को बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए दो बकरों की बलि देने से रोक कर पापकर्म से मुक्ति दिलाई |

मटरू की आँखे नाम हो गईं और उसने अपने परिवार द्वारा बकरे की बलि से होने वाले पाप से बचाने के लिए भगवान का कोटि-कोटि शुक्रिया अदा किया |


Monday, 24 September 2018

स्पर्श का मर्म




स्पर्श का मर्म
-राय साहब पाण्डेय
पादप धरती पर खड़े हुए,
हैं मूक बधिर से पड़े हुए,
बेबस आँखों से दृष्टिपात कर,
इंगित करते अनजान व्यथा,
इंगित करते अपनी व्यथा, पर सुने कौन?
हाँ, कौन सुने इनकी कथा |

अनकहा अगर सुन भी ले कोई,
तो क्या हल दे?
बेवश तो वह भी है,
है मुक्त नहीं वह भी बंधन से,
कोई पग से जकड़ा है तो कोई मन से,
दोनों की गति है एक रूप,
और एक दिखाई पड़े, पड़े ना,
पर एक समझना पड़ता है |


छू लेने भर से भी तो,
अपनत्व बोध हो सकता है,
पर इसमें भी कुछ कहा-सुनी का, 
अंदेशा तो रहता है,
स्पर्श की भाषा होती है,
स्पर्श भी मंशा रहित नहीं,
पर एक नियति तो तय समझो,
बिन कहे सुने भी अंकित है |

पढ़ सकते हैं जो चिरकालिक है,
कहने-सुनने की अरज नहीं,
बे-रुख हो या फिर कर्कश हो,
हो स्वार्थ-युक्त या निर्मल हो,
संज्ञा विहीन या छ्द्म्युक्त हो,
मंशा भी साफ़ झलकती है |

स्पर्श अगर है भाव-हीन,
फिर भाव कलश का मतलब क्या?
पुंज-प्रकाश भी अर्थहीन है,
तम से स्पर्श न हो उसका |

कण-कण में है आवेश भरा,
स्पर्श को व्याकुल क्षितिज खड़ा,
दूर रहे या रहे पास,
दृष्टियुक्त या दृष्टिहीन,
आयामयुक्त-आयामहीन,
स्पर्श का बंधन जीवन है,
तो जीवन का बंधन मुक्ति मार्ग |







Tuesday, 21 August 2018

मे डाम मे फी




मे डाम मे फी
-राय साहब पाण्डेय




किसी भी संस्कृति में पुरखों और पितरों को सम्मान एक उत्तम परंपरा है | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जो स्वजन इस संसार को छोड़ गए हैं वे चाहे किसी भी रूप में या किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति के लिए आदर पूर्वक जो तर्पण और शुभ संकल्प किया जाता है, उसे ही श्राद्ध कहा जाता है | श्राद्ध का अर्थ है अपने देवों, परिवार, वंश परंपरा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना । श्राद्ध पक्ष को पितृ-पक्ष या महालय के नाम से भी जाना जाता है | इस पक्ष का महात्म्य उत्तर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में बहुत अधिक है | दक्षिण भारत में इस पक्ष को अन्य नामों से बोला जाता है | तमिलनाडु में अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली  और महाराष्ट्र में पितृ पंधरवडा  नाम से जानते हैं |

आज 31 जनवरी है | शिवसागर टाउन में काफी चहल-पहल है | मटरू अपने रिक्शे में तीन-तीन सवारियों को भर-भर कर जोय सागर की तरफ ल जा रहे हैं ‘मे-डाम-मे-फी’ का सार्वजनिक  आयोजन जो है | ‘मे ’ का अर्थ है ‘चढ़ावा’, ‘डाम’ का मतलब ‘पूर्वज’ तथा ‘फी’ का तात्पर्य ‘देवताओं’  से होता है | असम में टाई-शान जनजाति के अहोम लोग अपने पूर्वजों के सम्मान में चढ़ावा चढ़ाते हैं और देवताओं को आहुति देते हैं | अहोम राजवंश के 600 सालों के लम्बे इतिहास में यहाँ के राजाओं ने इस क्षेत्र की संस्कृतियों को जोड़ने और आत्मसात्करण करने में एक केन्द्रीय भूमिका अदा की है | बड़े-बूढों का आदर करने का रसम-रिवाज यहाँ पर बखूबी मनाया जाता है और उन्हें देवतुल्य माना जाता है | वस्तुतः पिता के लिए असमिया भाषा में ‘देवता’ शब्द ही प्रचलित है | अहोम परंपरा में जो रिवाज प्रचलित हैं, उनमे उम्फा पूजा भी एक महत्त्वपूर्ण रिवाज है | इस पूजा में अहोम वंशजों के मुख्या देव ‘लेंग्दों’ , जो इनके पुरखे माने जाते हैं, की पूजा की जाती है | पुराने काल में यह पूजा अहोम राजा, राज्य और प्रजा की संपन्नता के लिए तथा शत्रु पर विजय के लिए किया जाता था | इस पूजा में झींगुरों, बत्तखों, मुर्गों, बकरों, सूअरों, बैलों, भैसों और हाथियों तक की बलि दी जाती थी | इस पूजा के लिए एक अष्टकोणीय वेदी निर्मित की जाती है जिसे ‘देवघर’ कहते हैं | इसके अलावा बांस के तीन अतिरिक्त चबूतरे दूसरे देवताओं के लिए बनाए जाते हैं | बीच की वेदी पर सात मुख्य प्राकृतिक देवताओं, जैसे- ‘लेंग्दों‘ (स्वर्ग का राजा), ‘लंग्दीन’ (पृथ्वी), ‘ख्वाक्हम’ (पानी का देवता), ‘चेंग-मुन’ –‘चेंग बान’ (सूर्य-चन्द्र), और ‘जसिंग्फा’(प्रज्ञा की देवी) इत्यादि की पूजा की जाती है | मध्य वेदी के दाईं ओर कुछ सामान्य देवताओं जैसे- ‘लंग्कुरी’(पर्वत देव), ‘लाई-लुंग-खां’(वन देवी) आदि की भी आराधना की जाती है | वेदियों के सम्मुख केले के पेड़ से बने दीप खंभ पर 25 दीये प्राकृतिक देवों (डोय-मा-लुंग-फुरा) के नाम पर प्रज्ज्वलित किए जाते हैं | पूजा के प्रारंभ में सभी वस्तुओं पर पवित्र जल (‘नाम-जा-रिऊ–जा-राइ’ ) छिड़का जाता है | पशुओं और पक्षियों की बलि उनके गर्दनों काट कर नहीं बल्कि दबा कर दी जाती है |

अस्सी के दशक में एक ‘टाई वाला जेंटलमैन’ शिवसागर कस्बे में साइकिल पर सवारी करते हुए अक्सर दिख जाते थे | सर पर एक अंग्रेजी हैट और हाथ में एक छड़ी भी हुआ करती थी | अक्सर लोगों को अंग्रेजी में हिदायत देते नज़र आते थे | ऐसा लगता था जैसे खुद ही ट्रैफिक पुलिस हों | बाहरी लोगों को उनके बारे में ज्यादा कुछ मालुम नहीं होता था | जोयसागर का फेरा लगाते-लगाते मटरू की मुलाकात इस ‘टाई वाले जेंटलमैन’ से हो गई | साइकिल सवार आज मटरू के रिक्शे पर सवार था | मटरू के लिए यह सवार अनजान नहीं था | कई बार यह जेंटलमैन मटरू के रिक्शे को रोक कर अंग्रेजी में डांट-फटकार लगाई थी | मटरू मे-डाम-मे-फी  के इस उत्सव के बारे में कुछ नहीं जानते थे पर जानने के लिए काफी उत्सुक थे | जेंटलमैन इसके बारे में जो जानता था, बताना शुरू किया | मे-डाम-मे-फी के इतिहास के बारे के में इतिहासकार बताते हैं कि राजा शुन्गमुंग दिहिंगिया ने धनसिरी नदी के किनारे कचारियों को हराने के पश्चात विजयोत्सव के दौरान उस समय की प्रचलित परंपरा के अनुसार राजा और प्रजा के दीर्घायु की कामना के लिए मे-डाम-मे-फीऔर ‘रिखन’ उत्सवों का आयोजन किया था | बाद के राजाओं में राजा प्रताप सिंघा ने भी दो बार मुगलों को हराने के बाद एवं तीसरी बार मुगलों से हारने के बाद पुरखों का आशीर्वाद और कृपा प्राप्ति हेतु इन उत्सवों का आयोजन किया था | अन्य राजाओं जैसे चक्रध्वज सिंघा, लखी सिंघा, चंद्रकांत सिंघा इत्यादि ने भी समय-समय पर विपत्तियों, आपदाओं तथा शत्रुओं के आक्रमण से राज्य को सुरक्षित रखने हेतु मे-डाम-मे-फी जैसे उत्सवों का आयोजन किया था |

अहमों में ऐसी मान्यता है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात केवल कुछ दिनों तक ही ‘डाम’ (पूर्वज) रहता है और शीघ्र ही वह ‘फी’ (देव) रूप में परिणित हो जाता है | मनुष्य की आत्मा, जो अमर है, परमात्मा में विलीन हो जाती है और आध्यात्मिक गुणों से संपन्न हो जाती है और परिवार के कल्याण के लिए आशीर्वाद देती है | इस विशवास के कारण ही प्रत्येक अहोम परिवार मृतकों की पूजा के लिए रसोई घर के सामने एक स्तम्भ (डामखुटा) स्थापित करता है और घर में बनी हुई सामग्री जैसे शराब (लव-पानी), माह-प्रसाद, भात एवं गोश्त-माछ चढ़ाता है | मे-डाम-मे-फी’  की पूजा अहोम पुजारियों (देवढाई और बेलुंग) द्वारा टाई मन्त्रों के जाप के बीच संपन्न कराई जाती है | इसका विधि-विधान फार्लुंग एवं बन्फी नामक अहोम पुस्तकों में वर्णित है |

मटरू को ‘मे-डाम-मे-फी’ के बारे में इतनी सब जानकारी मिलने के बाद असमिया लोगों पर बड़ा गर्व होने लगा | अपने पूर्वजों का इतना सम्मान! सचमुच यह एक अनोखी परंपरा है जो अहोम लोगों की पुरानी विरासतों को मूल रूप में आज भी जिन्दा रखे हुए है | इन परम्पराओं के चलते अहोम निवासी आपस में भाई-चारा और एकता के सूत्र में बधें हुए हैं |


Thursday, 26 July 2018

नफ़रत की आग



नफ़रत की आग 

-राय साहब पाण्डेय 

दिल धड़कता है जब नफरत की सांसों से,
डाह की दाह बन जाती है चिनगारी,
चिनगारियां टकराती कब बन के अंगारे?
राखों के जखीरों से इल्म होता है |

चिंगारियों से प्यार के चूल्हे जलते हैं,
चिनगारिया होती हैं उद्यमों का उद्गम,
बेकाबू हो जाते हैं जब अंगारे निरंकुश,
तमक से इनके तो बस हैं घर जलते |

जब भड़कती है अह्मों की ज्वाला,
 गरल आहुतियां धधकाती हैं अंगारे,
कौन करे भेद, अर्थ क्या अनर्थ क्या?
मिटटी में मिलने को बस आतुर सारे |

कब मिटती है नफरत से नफरत ?
देखा कभी अंगारों से अंगारे बुझते?
शांति सिंचित जीवन, जीवंत रूप है,
धुल जाते सब जब मन हो निर्मल |

कुदरत में भी चिनगारी पैदा होती है,
बनती सबब दावानल के सृजन का,
हम तो इंसानियत तबाह करते हैं,
ख़ाक कर खुद के बनाए गुलशन का |

Thursday, 5 July 2018

बकरे की खैर






3: बकरे की खैर
-राय साहब पाण्डेय 

जाड़े के दिनों में शिवसागर में न्यूनतम तापमान 14 डिग्री सेल्सिअस के आस-पास तक पहुँच जाता है और सुबह में अक्सर अच्छी-खासी ठण्ड पड़ती है | एक दिन सुबह-सुबह मटरू लंगड़ाते हुए घर पर आ धमके | मन-ही मन सोचा- पता नहीं आज क्या मुसीबत ले कर आए हैं | फिर भी मैंने उन्हें इत्मीनान से बैठने के लिए आश्वस्त किया | मुझे पूरा यकीन है धर्मपत्नी ने उनको देखते ही जरूर सोचा होगा: कहाँ- कहाँ से लोगों को पाल लेते हैं | मैंने पूछा, "क्या बात है मटरूजी लंगड़ा काहे रहे हो ?” अपने दाएँ पैर को आगे बढ़ाते हुए बोले, “ठोकर लग गई है |” सचमुच अंगूठे का नाखून निकल गया था और उस पर ढेर सारा खून जमा हो गया था | ऐसा प्रतीत हो रहा था उनका पैर असावधानी वश  अचानक किसी भारी पत्थर से टकरा गया था | खुले पैर को जाड़े में जब चोट लगती है तो ऐसा ही होता है | दर्द का आभास थोड़ी देर में होता है | खैर, उनका पैर धुलवाने के बाद उस पर एंटीबायोटिक ऑइंटमेंट लगवाया गया | चाय पीने के बाद मैंने पूछा, “मटरूजी, एकदम सुबह-सुबह, कुछ विशेष बात है क्या ?” मुँह से कुछ बोलते, उसके पहले ही अपनी जेब से एक मनी आर्डर फॉर्म निकाला और मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, “भरना है” | “कहाँ से फॉर्म लिया था, कुछ पैसे भी दिए थे क्या”, मैंने पूछा | मटरू अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे, “बिना पैसे के कौन देगा | फॉर्म ले कर खिड़की पर जब नंबर लगाऊंगा और खिड़की वाले बाबू को अगर छुट्टे पैसे गिनकर दे दिया तो तो वह मेरा फॉर्म और पैसा दोनों वापस कर देगा और दूसरे को बुला लेगा |” “ऐसा क्यों“, मैंने उत्सुकता वस पूछ लिया | मटरू ने समझाना शुरू किया, “मान लीजिए 100 रुपए का मनी आर्डर करना है और उसकी लगवाई मिला कर 102 रुपए दिया तो पैसा वापस | और 105 रुपए दिया तो तुरंत रसीद हाथ में |”  मैं ताड़ गया | यहाँ भी कमीशन खोरी |

“ठीक है, मैं भेज दूंगा, आप मुझे दे दीजिए”, मटरू के कुछ पैसे बचाने की नीयत से मैंने सुझाया | “घर से चिट्ठी आई है, बहुत जरूरी है | किसी से उधार ले कर कुछ काम कराया है, बच्चा बीमार रहता था”, मटरू ने पैसा जल्दी भेजने का कारण समझाते हुए बताया | “बच्चा बीमार रहता था तो काम क्या कराया? डॉक्टर से इलाज़ करवाना था”, मैंने यों ही पूछ लिया | मटरू सकुचाए, पर अपनी जो कथा सुनाई वह आज भी हिंदुस्तान के गांवों की, खासकर गरीब तबके के लोगों की, हकीकत बयाँ करती है |

मटरू बिहार राज्य के पूर्वी चंपारण जिले के मूल निवासी थे | मोतिहारी इस जिले का मुख्यालय है | कोई भी व्यक्ति जो गाँधीजी के बारे में थोडा भी पढ़ा होगा, वह चंपारण का नाम अवश्य जानता होगा क्योंकि यहीं से उन्होंने अपना राजनीतिक आंदोलन शुरू किया था | बिहार का यह भूखंड नेपाल की सीमा से सटा हुआ है | पूर्व में यह राजा जनक के राज्य का एक अटूट हिस्सा था | मटरू का अपना पैत्रिक निवास केसरिया के पास था | केसरिया पुरातात्विक महत्व का प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है। मटरू का गाँव भी गंडक के आस-पास स्थित था, जहाँ बाढ़ से हर साल तवाही आम बात थी | मटरू की अपनी कोई खेती-बाड़ी नहीं थी | गाँव में भी दूसरे के खेत में काम कर के गुजारा करते थे | आर्थिक स्थिति से तंग आकर एक दिन बाहर जाने का मन बना लिए | फिर क्या ? भगवान केशरनाथ मंदिर में बटुक लिंग रूप में स्थापित शिवजी के दर्शन को निकल पड़े । यह लिंग सभी शिवलिंगों मे केसरिया की सबसे अमूल्य निधि माना जाता है। यह शिवलिंग 19690 में नहर की खुदाई के दौरान मिला था । विद्वानों का मानना है कि यह  विश्व का अनमोल शिवलिंग है जिसका जिक्र शिवपुराण में मिलता है । इस कारण स्थानीय लोगों में इस शिवलिंग के प्रति बड़ी श्रद्धा है | शिव के आशीर्वाद से लैस मटरू तिनसुकिया मेल में सवार हो लिए | बड़ी लाइन की सवारी न्यू बोंगाईगाँव में समाप्त हो गई | फिर छोटी लाइन की तिनसुकिया में सवार हो गए | सामान्य श्रेणी के डिब्बे में उनके जैसे अनेक यात्री यात्रा कर रहे थे | कुछ नए, कुछ पुराने | शिवसागर का नाम उनके जेहन में कंठ हो गया था, अतः शिवसागर वाले यात्रियों से उनकी जान-पहचान हो गई | अपने नए परिचितों के साथ शिमलगुड़ी स्टेशन पर अपना चरण रख ही दिया | बची-खुची रात स्टेशन पर सो कर गुजार दी, बिना किसी डर के | खोने के लिए था भी क्या ? नए दोस्तों पर यकीन करने के अतिरिक्त उनके पास कोई और चारा नहीं था, सो उनके साथ हो लिए एक नये मुकाम पर, एक नई सुबह की तलाश में |

मटरू थोड़ी देर के लिए रुके और फिर शुरू हो गए | मेरा बेटा टिंकू छह साल का है | अक्सर बीमार रहता है | पास के डॉक्टरों से काफी इलाज कराया, पर कोई लाभ नहीं हुआ | फिर किसी ने एक ओझा का नाम लिया | टिंकू की माँ बेटे को लेकर ओझा के पास गई | पता नहीं भैयाजी ये ओझा लोग चिलम-तम्बाकू क्यों गुड़गुड़ाते रहते हैं? और इन्हें शायद पानी से भी डर लगता है इसलिए नहाते भी कम ही हैं | मैंने मटरू की हाँ में हाँ मिलाई और अपनी तरफ से भी कुछ जोड़ दिया | “हाँ मटरू, इनके उस्ताद लोग इन्हें इसी तरह की ट्रेनिंग देते हैं और गंदगी से ही इनकी बुदबुदाने वाली मंत्र शक्ति ज्यादा प्रज्ज्वलित होती है”, मैंने धीरे से चुटकी ली | मन ही मन मैं सोच रहा था, मटरू भले ही पढ़ा-लिखा नहीं है तो क्या, हास्य-विनोद में कोई कमी नहीं है | “भैयाजी, इन सब बातों में यकीन करने का मन तो नहीं होता लेकिन परिवार का दबाव औए बच्चे के ठीक होने की उम्मीद के कारण सब करना पड़ रहा है”, मटरू फिर शुरू हो गए |

वार्तालाप एक नया मोड़ ले रहा था | मेरी भी उत्सुकता बढ़ रही थी | मटरू कुछ क्षण रुकने के बाद बोले, “शुरू-शुरू में पता नहीं कौन सा भभूत दिया, एक लगाने के लिए और एक खाने के लिए | टिंकू की फुर्ती के साथ-साथ उसकी माँ का यकीन भी बढ़ने लगा | अब तो पूरा परिवार ही ओझा की काबीलियत का कायल हो गया | कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा | एक दिन ओझा, जिसे गाँव में सोखा भी बोलते हैं, ने टिंकू की माँ से कहा, “बिटिया, परसों अमौसा की रात है, कुछ विशेष सामग्री का इंतजाम करना होगा | सामान के साथ-साथ एक होनहार खसी (बकरा) भी लगेगा | या तो तुम ही इंतजाम कर दो या उसकी कीमत दे दो, हम खुद जुगाड़ कर लेंगे |” बात कुछ और होती तो रामकली ( टिंकू की अम्मा ) शायद मना कर देती, पर यहाँ तो टिंकू के जीवन का सवाल था, सो मन गई | इधर-उधर से ले दे कर पैसों का इंतजाम करना पड़ा | बाकी सब इंतजाम ओझा और उसके गुर्गों ने कर दिया | लोगों की नज़रों से बच-बचाकर रामकली, टिंकू और रमेसर ( टिंकू के मामा ) रात में ग्यारह बजे ओझा द्वारा बताए गए एक सुनसान जगह पर पहुँच गए | ओझा और उसके कारीगर पहले से ही मौजूद थे | चुनरी, नारियल, फल, मालाफूल और न जाने क्या-क्या सामग्री वहाँ एक जलते अंगारों के पास में रखा था | इस दिव्य प्रज्ज्वलित अग्नि से लगभग बीस फुट की दूरी पर एक मेमने जैसा निरीह खसी एक ताजे गड़े खूंटे से बंधा था जिसके सामने कुछ हरी घास और एक कटोरे में चूनी-चोकर भी पड़ा था | आखिरकार आज तो उसी की रात थी !”

ओझा के सागिर्दों ने अपने करतब दिखाना प्रारंभ किया | वे सामग्री से कुछ सामान उठाते और टिंकू के सर से, कभी माथे से और कभी दिल से छूते और जलती चिता में छोड़ देते | पूरा वातावरण एक अजीब सी गंध से भर गया | फिर टिंकू को कुछ खिलाया गया और इसके बाद ही उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं | टिंकू जोर-जोर से अपना सर हिला कर नचाने लगा | कुछ देर यह सब चलता रहा | अब प्रमुख ओझा की बारी आई | यह साधारण सा दिखने वाला ओझा आज तो बड़ा भयानक लग रहा था | गांजे के नशे में धुत उसकी आँखे एक दम लाल अंगारे के सदृश लग रही थीं | ओझा ने अपनी कड़क आवाज़ में लगभग डपटते हुए टिंकू से कहा, “कौन है तूँ ? तुम्हारी मंशा क्या है ? इस बच्चे को क्यों जकड़ा है ? आज तो तुम्हारी खैर नहीं | अभी, इसी वक़्त तुम्हारी बलि चढ़ा दूंगा |” टिंकू की माँ और रमेसर दोनों डर के मारे थर –थर काँप रहे थे और मन ही मन हनुमान चालीसा भी पढ़ रहे थे | मारे डर के टिंकू भी घिघियाने लगा | क्या बोल रहा है, ओझा और उसके सागिर्दों के अलावा कोई नहीं समझ सकता था | “अच्छा तो तूँ है | बोल छोड़ता है या नहीं ? अभी तुमको तेस्तनाबूद कर देता हूँ | ठीक है, तूँ ऐसे नहीं मानेगा तो ये ले |” ओझा पास में रखी एक कुल्हाड़ी को हवा में नचाने लगा | यह सब देख कर टिंकू और डर गया और बोलने लगा, “नहीं, नहीं” | ओझा जोर से हँसा और कहने लगा, “ले आ अमानत ले आ” | तुरंत ही एक गुर्गे ने पास में बंधी खंसी को मालाफूल पहना कर, तिलक से सुसज्जित कर आग के सामने हाज़िर कर दिया |

अब क्या था, ओझा उठा | लपलपाती कुल्हाड़ी उठाई और हवा में लहराते हुए बकरे की गर्दन पर रख दी | एक पल को लगा कि बकरा तो गया, पर ऐसा हुआ नहीं | बकरा बच गया | विजयी मुद्रा में ओझा ने दोनों हाथ ऊपर उठाया और जय भूतनाथ, जय भूतनाथ का जयघोष करने लगा | गुर्गों ने टिंकू को हलके से थपथपाया और मुँह पर पानी के छीटें मारे | फिर ओझा ने टिंकू की पीठ थपथपाई और कहा, “टिंकू अब बिलकुल ठीक है” | रमेसर और रामकली ने भी राहत की सांस ली | आज रात का कार्यक्रम समाप्त हुआ पर रामकली का नहीं | श्रीमान ओझा ने रामकली से कहा, “बिटिया, यह बकरा तो बच गया, अब इसकी बलि भी नहीं दी जा सकती और न ही इसे किसी अन्य को बेचा जा सकता है | इसे तो मजबूरन मुझे ही रखना पड़ेगा और सुरक्षित भी रखना पड़ेगा कम से कम एक साल तक | तुम्हें टिंकू की परवरिश करनी पड़ेगी और मुझे इस बकरे की | इसका कम से कम एक हज़ार रुपया तो लगेगा अन्यथा कुछ भी अनिष्ट हो सकता है |

मरता क्या न करता | रामकली मान गई | मानती भी क्यों न ? टिंकू की जान अब बकरे की जान से जो जुड़ चुकी थी | बकरे की खैर में ही टिंकू की खैर थी | सवेरे ओझाजी के बकरों की जमात में एक और बकरा शामिल था | गाँव में मूंछों पर ताव देते ओझाजी हाँथ में बांस की एक सुटकुन थामे बकरों को बहोर रहे थे और दूर शिवसागर में मटरू मनी आर्डर भेजने की जद्दोजहद में |