Monday, 24 September 2018

स्पर्श का मर्म




स्पर्श का मर्म
-राय साहब पाण्डेय
पादप धरती पर खड़े हुए,
हैं मूक बधिर से पड़े हुए,
बेबस आँखों से दृष्टिपात कर,
इंगित करते अनजान व्यथा,
इंगित करते अपनी व्यथा, पर सुने कौन?
हाँ, कौन सुने इनकी कथा |

अनकहा अगर सुन भी ले कोई,
तो क्या हल दे?
बेवश तो वह भी है,
है मुक्त नहीं वह भी बंधन से,
कोई पग से जकड़ा है तो कोई मन से,
दोनों की गति है एक रूप,
और एक दिखाई पड़े, पड़े ना,
पर एक समझना पड़ता है |


छू लेने भर से भी तो,
अपनत्व बोध हो सकता है,
पर इसमें भी कुछ कहा-सुनी का, 
अंदेशा तो रहता है,
स्पर्श की भाषा होती है,
स्पर्श भी मंशा रहित नहीं,
पर एक नियति तो तय समझो,
बिन कहे सुने भी अंकित है |

पढ़ सकते हैं जो चिरकालिक है,
कहने-सुनने की अरज नहीं,
बे-रुख हो या फिर कर्कश हो,
हो स्वार्थ-युक्त या निर्मल हो,
संज्ञा विहीन या छ्द्म्युक्त हो,
मंशा भी साफ़ झलकती है |

स्पर्श अगर है भाव-हीन,
फिर भाव कलश का मतलब क्या?
पुंज-प्रकाश भी अर्थहीन है,
तम से स्पर्श न हो उसका |

कण-कण में है आवेश भरा,
स्पर्श को व्याकुल क्षितिज खड़ा,
दूर रहे या रहे पास,
दृष्टियुक्त या दृष्टिहीन,
आयामयुक्त-आयामहीन,
स्पर्श का बंधन जीवन है,
तो जीवन का बंधन मुक्ति मार्ग |







Tuesday, 21 August 2018

मे डाम मे फी




मे डाम मे फी
-राय साहब पाण्डेय




किसी भी संस्कृति में पुरखों और पितरों को सम्मान एक उत्तम परंपरा है | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जो स्वजन इस संसार को छोड़ गए हैं वे चाहे किसी भी रूप में या किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति के लिए आदर पूर्वक जो तर्पण और शुभ संकल्प किया जाता है, उसे ही श्राद्ध कहा जाता है | श्राद्ध का अर्थ है अपने देवों, परिवार, वंश परंपरा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना । श्राद्ध पक्ष को पितृ-पक्ष या महालय के नाम से भी जाना जाता है | इस पक्ष का महात्म्य उत्तर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में बहुत अधिक है | दक्षिण भारत में इस पक्ष को अन्य नामों से बोला जाता है | तमिलनाडु में अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली  और महाराष्ट्र में पितृ पंधरवडा  नाम से जानते हैं |

आज 31 जनवरी है | शिवसागर टाउन में काफी चहल-पहल है | मटरू अपने रिक्शे में तीन-तीन सवारियों को भर-भर कर जोय सागर की तरफ ल जा रहे हैं ‘मे-डाम-मे-फी’ का सार्वजनिक  आयोजन जो है | ‘मे ’ का अर्थ है ‘चढ़ावा’, ‘डाम’ का मतलब ‘पूर्वज’ तथा ‘फी’ का तात्पर्य ‘देवताओं’  से होता है | असम में टाई-शान जनजाति के अहोम लोग अपने पूर्वजों के सम्मान में चढ़ावा चढ़ाते हैं और देवताओं को आहुति देते हैं | अहोम राजवंश के 600 सालों के लम्बे इतिहास में यहाँ के राजाओं ने इस क्षेत्र की संस्कृतियों को जोड़ने और आत्मसात्करण करने में एक केन्द्रीय भूमिका अदा की है | बड़े-बूढों का आदर करने का रसम-रिवाज यहाँ पर बखूबी मनाया जाता है और उन्हें देवतुल्य माना जाता है | वस्तुतः पिता के लिए असमिया भाषा में ‘देवता’ शब्द ही प्रचलित है | अहोम परंपरा में जो रिवाज प्रचलित हैं, उनमे उम्फा पूजा भी एक महत्त्वपूर्ण रिवाज है | इस पूजा में अहोम वंशजों के मुख्या देव ‘लेंग्दों’ , जो इनके पुरखे माने जाते हैं, की पूजा की जाती है | पुराने काल में यह पूजा अहोम राजा, राज्य और प्रजा की संपन्नता के लिए तथा शत्रु पर विजय के लिए किया जाता था | इस पूजा में झींगुरों, बत्तखों, मुर्गों, बकरों, सूअरों, बैलों, भैसों और हाथियों तक की बलि दी जाती थी | इस पूजा के लिए एक अष्टकोणीय वेदी निर्मित की जाती है जिसे ‘देवघर’ कहते हैं | इसके अलावा बांस के तीन अतिरिक्त चबूतरे दूसरे देवताओं के लिए बनाए जाते हैं | बीच की वेदी पर सात मुख्य प्राकृतिक देवताओं, जैसे- ‘लेंग्दों‘ (स्वर्ग का राजा), ‘लंग्दीन’ (पृथ्वी), ‘ख्वाक्हम’ (पानी का देवता), ‘चेंग-मुन’ –‘चेंग बान’ (सूर्य-चन्द्र), और ‘जसिंग्फा’(प्रज्ञा की देवी) इत्यादि की पूजा की जाती है | मध्य वेदी के दाईं ओर कुछ सामान्य देवताओं जैसे- ‘लंग्कुरी’(पर्वत देव), ‘लाई-लुंग-खां’(वन देवी) आदि की भी आराधना की जाती है | वेदियों के सम्मुख केले के पेड़ से बने दीप खंभ पर 25 दीये प्राकृतिक देवों (डोय-मा-लुंग-फुरा) के नाम पर प्रज्ज्वलित किए जाते हैं | पूजा के प्रारंभ में सभी वस्तुओं पर पवित्र जल (‘नाम-जा-रिऊ–जा-राइ’ ) छिड़का जाता है | पशुओं और पक्षियों की बलि उनके गर्दनों काट कर नहीं बल्कि दबा कर दी जाती है |

अस्सी के दशक में एक ‘टाई वाला जेंटलमैन’ शिवसागर कस्बे में साइकिल पर सवारी करते हुए अक्सर दिख जाते थे | सर पर एक अंग्रेजी हैट और हाथ में एक छड़ी भी हुआ करती थी | अक्सर लोगों को अंग्रेजी में हिदायत देते नज़र आते थे | ऐसा लगता था जैसे खुद ही ट्रैफिक पुलिस हों | बाहरी लोगों को उनके बारे में ज्यादा कुछ मालुम नहीं होता था | जोयसागर का फेरा लगाते-लगाते मटरू की मुलाकात इस ‘टाई वाले जेंटलमैन’ से हो गई | साइकिल सवार आज मटरू के रिक्शे पर सवार था | मटरू के लिए यह सवार अनजान नहीं था | कई बार यह जेंटलमैन मटरू के रिक्शे को रोक कर अंग्रेजी में डांट-फटकार लगाई थी | मटरू मे-डाम-मे-फी  के इस उत्सव के बारे में कुछ नहीं जानते थे पर जानने के लिए काफी उत्सुक थे | जेंटलमैन इसके बारे में जो जानता था, बताना शुरू किया | मे-डाम-मे-फी के इतिहास के बारे के में इतिहासकार बताते हैं कि राजा शुन्गमुंग दिहिंगिया ने धनसिरी नदी के किनारे कचारियों को हराने के पश्चात विजयोत्सव के दौरान उस समय की प्रचलित परंपरा के अनुसार राजा और प्रजा के दीर्घायु की कामना के लिए मे-डाम-मे-फीऔर ‘रिखन’ उत्सवों का आयोजन किया था | बाद के राजाओं में राजा प्रताप सिंघा ने भी दो बार मुगलों को हराने के बाद एवं तीसरी बार मुगलों से हारने के बाद पुरखों का आशीर्वाद और कृपा प्राप्ति हेतु इन उत्सवों का आयोजन किया था | अन्य राजाओं जैसे चक्रध्वज सिंघा, लखी सिंघा, चंद्रकांत सिंघा इत्यादि ने भी समय-समय पर विपत्तियों, आपदाओं तथा शत्रुओं के आक्रमण से राज्य को सुरक्षित रखने हेतु मे-डाम-मे-फी जैसे उत्सवों का आयोजन किया था |

अहमों में ऐसी मान्यता है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात केवल कुछ दिनों तक ही ‘डाम’ (पूर्वज) रहता है और शीघ्र ही वह ‘फी’ (देव) रूप में परिणित हो जाता है | मनुष्य की आत्मा, जो अमर है, परमात्मा में विलीन हो जाती है और आध्यात्मिक गुणों से संपन्न हो जाती है और परिवार के कल्याण के लिए आशीर्वाद देती है | इस विशवास के कारण ही प्रत्येक अहोम परिवार मृतकों की पूजा के लिए रसोई घर के सामने एक स्तम्भ (डामखुटा) स्थापित करता है और घर में बनी हुई सामग्री जैसे शराब (लव-पानी), माह-प्रसाद, भात एवं गोश्त-माछ चढ़ाता है | मे-डाम-मे-फी’  की पूजा अहोम पुजारियों (देवढाई और बेलुंग) द्वारा टाई मन्त्रों के जाप के बीच संपन्न कराई जाती है | इसका विधि-विधान फार्लुंग एवं बन्फी नामक अहोम पुस्तकों में वर्णित है |

मटरू को ‘मे-डाम-मे-फी’ के बारे में इतनी सब जानकारी मिलने के बाद असमिया लोगों पर बड़ा गर्व होने लगा | अपने पूर्वजों का इतना सम्मान! सचमुच यह एक अनोखी परंपरा है जो अहोम लोगों की पुरानी विरासतों को मूल रूप में आज भी जिन्दा रखे हुए है | इन परम्पराओं के चलते अहोम निवासी आपस में भाई-चारा और एकता के सूत्र में बधें हुए हैं |


Thursday, 26 July 2018

नफ़रत की आग



नफ़रत की आग 

-राय साहब पाण्डेय 

दिल धड़कता है जब नफरत की सांसों से,
डाह की दाह बन जाती है चिनगारी,
चिनगारियां टकराती कब बन के अंगारे?
राखों के जखीरों से इल्म होता है |

चिंगारियों से प्यार के चूल्हे जलते हैं,
चिनगारिया होती हैं उद्यमों का उद्गम,
बेकाबू हो जाते हैं जब अंगारे निरंकुश,
तमक से इनके तो बस हैं घर जलते |

जब भड़कती है अह्मों की ज्वाला,
 गरल आहुतियां धधकाती हैं अंगारे,
कौन करे भेद, अर्थ क्या अनर्थ क्या?
मिटटी में मिलने को बस आतुर सारे |

कब मिटती है नफरत से नफरत ?
देखा कभी अंगारों से अंगारे बुझते?
शांति सिंचित जीवन, जीवंत रूप है,
धुल जाते सब जब मन हो निर्मल |

कुदरत में भी चिनगारी पैदा होती है,
बनती सबब दावानल के सृजन का,
हम तो इंसानियत तबाह करते हैं,
ख़ाक कर खुद के बनाए गुलशन का |

Thursday, 5 July 2018

बकरे की खैर






3: बकरे की खैर
-राय साहब पाण्डेय 

जाड़े के दिनों में शिवसागर में न्यूनतम तापमान 14 डिग्री सेल्सिअस के आस-पास तक पहुँच जाता है और सुबह में अक्सर अच्छी-खासी ठण्ड पड़ती है | एक दिन सुबह-सुबह मटरू लंगड़ाते हुए घर पर आ धमके | मन-ही मन सोचा- पता नहीं आज क्या मुसीबत ले कर आए हैं | फिर भी मैंने उन्हें इत्मीनान से बैठने के लिए आश्वस्त किया | मुझे पूरा यकीन है धर्मपत्नी ने उनको देखते ही जरूर सोचा होगा: कहाँ- कहाँ से लोगों को पाल लेते हैं | मैंने पूछा, "क्या बात है मटरूजी लंगड़ा काहे रहे हो ?” अपने दाएँ पैर को आगे बढ़ाते हुए बोले, “ठोकर लग गई है |” सचमुच अंगूठे का नाखून निकल गया था और उस पर ढेर सारा खून जमा हो गया था | ऐसा प्रतीत हो रहा था उनका पैर असावधानी वश  अचानक किसी भारी पत्थर से टकरा गया था | खुले पैर को जाड़े में जब चोट लगती है तो ऐसा ही होता है | दर्द का आभास थोड़ी देर में होता है | खैर, उनका पैर धुलवाने के बाद उस पर एंटीबायोटिक ऑइंटमेंट लगवाया गया | चाय पीने के बाद मैंने पूछा, “मटरूजी, एकदम सुबह-सुबह, कुछ विशेष बात है क्या ?” मुँह से कुछ बोलते, उसके पहले ही अपनी जेब से एक मनी आर्डर फॉर्म निकाला और मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, “भरना है” | “कहाँ से फॉर्म लिया था, कुछ पैसे भी दिए थे क्या”, मैंने पूछा | मटरू अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे, “बिना पैसे के कौन देगा | फॉर्म ले कर खिड़की पर जब नंबर लगाऊंगा और खिड़की वाले बाबू को अगर छुट्टे पैसे गिनकर दे दिया तो तो वह मेरा फॉर्म और पैसा दोनों वापस कर देगा और दूसरे को बुला लेगा |” “ऐसा क्यों“, मैंने उत्सुकता वस पूछ लिया | मटरू ने समझाना शुरू किया, “मान लीजिए 100 रुपए का मनी आर्डर करना है और उसकी लगवाई मिला कर 102 रुपए दिया तो पैसा वापस | और 105 रुपए दिया तो तुरंत रसीद हाथ में |”  मैं ताड़ गया | यहाँ भी कमीशन खोरी |

“ठीक है, मैं भेज दूंगा, आप मुझे दे दीजिए”, मटरू के कुछ पैसे बचाने की नीयत से मैंने सुझाया | “घर से चिट्ठी आई है, बहुत जरूरी है | किसी से उधार ले कर कुछ काम कराया है, बच्चा बीमार रहता था”, मटरू ने पैसा जल्दी भेजने का कारण समझाते हुए बताया | “बच्चा बीमार रहता था तो काम क्या कराया? डॉक्टर से इलाज़ करवाना था”, मैंने यों ही पूछ लिया | मटरू सकुचाए, पर अपनी जो कथा सुनाई वह आज भी हिंदुस्तान के गांवों की, खासकर गरीब तबके के लोगों की, हकीकत बयाँ करती है |

मटरू बिहार राज्य के पूर्वी चंपारण जिले के मूल निवासी थे | मोतिहारी इस जिले का मुख्यालय है | कोई भी व्यक्ति जो गाँधीजी के बारे में थोडा भी पढ़ा होगा, वह चंपारण का नाम अवश्य जानता होगा क्योंकि यहीं से उन्होंने अपना राजनीतिक आंदोलन शुरू किया था | बिहार का यह भूखंड नेपाल की सीमा से सटा हुआ है | पूर्व में यह राजा जनक के राज्य का एक अटूट हिस्सा था | मटरू का अपना पैत्रिक निवास केसरिया के पास था | केसरिया पुरातात्विक महत्व का प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है। मटरू का गाँव भी गंडक के आस-पास स्थित था, जहाँ बाढ़ से हर साल तवाही आम बात थी | मटरू की अपनी कोई खेती-बाड़ी नहीं थी | गाँव में भी दूसरे के खेत में काम कर के गुजारा करते थे | आर्थिक स्थिति से तंग आकर एक दिन बाहर जाने का मन बना लिए | फिर क्या ? भगवान केशरनाथ मंदिर में बटुक लिंग रूप में स्थापित शिवजी के दर्शन को निकल पड़े । यह लिंग सभी शिवलिंगों मे केसरिया की सबसे अमूल्य निधि माना जाता है। यह शिवलिंग 19690 में नहर की खुदाई के दौरान मिला था । विद्वानों का मानना है कि यह  विश्व का अनमोल शिवलिंग है जिसका जिक्र शिवपुराण में मिलता है । इस कारण स्थानीय लोगों में इस शिवलिंग के प्रति बड़ी श्रद्धा है | शिव के आशीर्वाद से लैस मटरू तिनसुकिया मेल में सवार हो लिए | बड़ी लाइन की सवारी न्यू बोंगाईगाँव में समाप्त हो गई | फिर छोटी लाइन की तिनसुकिया में सवार हो गए | सामान्य श्रेणी के डिब्बे में उनके जैसे अनेक यात्री यात्रा कर रहे थे | कुछ नए, कुछ पुराने | शिवसागर का नाम उनके जेहन में कंठ हो गया था, अतः शिवसागर वाले यात्रियों से उनकी जान-पहचान हो गई | अपने नए परिचितों के साथ शिमलगुड़ी स्टेशन पर अपना चरण रख ही दिया | बची-खुची रात स्टेशन पर सो कर गुजार दी, बिना किसी डर के | खोने के लिए था भी क्या ? नए दोस्तों पर यकीन करने के अतिरिक्त उनके पास कोई और चारा नहीं था, सो उनके साथ हो लिए एक नये मुकाम पर, एक नई सुबह की तलाश में |

मटरू थोड़ी देर के लिए रुके और फिर शुरू हो गए | मेरा बेटा टिंकू छह साल का है | अक्सर बीमार रहता है | पास के डॉक्टरों से काफी इलाज कराया, पर कोई लाभ नहीं हुआ | फिर किसी ने एक ओझा का नाम लिया | टिंकू की माँ बेटे को लेकर ओझा के पास गई | पता नहीं भैयाजी ये ओझा लोग चिलम-तम्बाकू क्यों गुड़गुड़ाते रहते हैं? और इन्हें शायद पानी से भी डर लगता है इसलिए नहाते भी कम ही हैं | मैंने मटरू की हाँ में हाँ मिलाई और अपनी तरफ से भी कुछ जोड़ दिया | “हाँ मटरू, इनके उस्ताद लोग इन्हें इसी तरह की ट्रेनिंग देते हैं और गंदगी से ही इनकी बुदबुदाने वाली मंत्र शक्ति ज्यादा प्रज्ज्वलित होती है”, मैंने धीरे से चुटकी ली | मन ही मन मैं सोच रहा था, मटरू भले ही पढ़ा-लिखा नहीं है तो क्या, हास्य-विनोद में कोई कमी नहीं है | “भैयाजी, इन सब बातों में यकीन करने का मन तो नहीं होता लेकिन परिवार का दबाव औए बच्चे के ठीक होने की उम्मीद के कारण सब करना पड़ रहा है”, मटरू फिर शुरू हो गए |

वार्तालाप एक नया मोड़ ले रहा था | मेरी भी उत्सुकता बढ़ रही थी | मटरू कुछ क्षण रुकने के बाद बोले, “शुरू-शुरू में पता नहीं कौन सा भभूत दिया, एक लगाने के लिए और एक खाने के लिए | टिंकू की फुर्ती के साथ-साथ उसकी माँ का यकीन भी बढ़ने लगा | अब तो पूरा परिवार ही ओझा की काबीलियत का कायल हो गया | कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा | एक दिन ओझा, जिसे गाँव में सोखा भी बोलते हैं, ने टिंकू की माँ से कहा, “बिटिया, परसों अमौसा की रात है, कुछ विशेष सामग्री का इंतजाम करना होगा | सामान के साथ-साथ एक होनहार खसी (बकरा) भी लगेगा | या तो तुम ही इंतजाम कर दो या उसकी कीमत दे दो, हम खुद जुगाड़ कर लेंगे |” बात कुछ और होती तो रामकली ( टिंकू की अम्मा ) शायद मना कर देती, पर यहाँ तो टिंकू के जीवन का सवाल था, सो मन गई | इधर-उधर से ले दे कर पैसों का इंतजाम करना पड़ा | बाकी सब इंतजाम ओझा और उसके गुर्गों ने कर दिया | लोगों की नज़रों से बच-बचाकर रामकली, टिंकू और रमेसर ( टिंकू के मामा ) रात में ग्यारह बजे ओझा द्वारा बताए गए एक सुनसान जगह पर पहुँच गए | ओझा और उसके कारीगर पहले से ही मौजूद थे | चुनरी, नारियल, फल, मालाफूल और न जाने क्या-क्या सामग्री वहाँ एक जलते अंगारों के पास में रखा था | इस दिव्य प्रज्ज्वलित अग्नि से लगभग बीस फुट की दूरी पर एक मेमने जैसा निरीह खसी एक ताजे गड़े खूंटे से बंधा था जिसके सामने कुछ हरी घास और एक कटोरे में चूनी-चोकर भी पड़ा था | आखिरकार आज तो उसी की रात थी !”

ओझा के सागिर्दों ने अपने करतब दिखाना प्रारंभ किया | वे सामग्री से कुछ सामान उठाते और टिंकू के सर से, कभी माथे से और कभी दिल से छूते और जलती चिता में छोड़ देते | पूरा वातावरण एक अजीब सी गंध से भर गया | फिर टिंकू को कुछ खिलाया गया और इसके बाद ही उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं | टिंकू जोर-जोर से अपना सर हिला कर नचाने लगा | कुछ देर यह सब चलता रहा | अब प्रमुख ओझा की बारी आई | यह साधारण सा दिखने वाला ओझा आज तो बड़ा भयानक लग रहा था | गांजे के नशे में धुत उसकी आँखे एक दम लाल अंगारे के सदृश लग रही थीं | ओझा ने अपनी कड़क आवाज़ में लगभग डपटते हुए टिंकू से कहा, “कौन है तूँ ? तुम्हारी मंशा क्या है ? इस बच्चे को क्यों जकड़ा है ? आज तो तुम्हारी खैर नहीं | अभी, इसी वक़्त तुम्हारी बलि चढ़ा दूंगा |” टिंकू की माँ और रमेसर दोनों डर के मारे थर –थर काँप रहे थे और मन ही मन हनुमान चालीसा भी पढ़ रहे थे | मारे डर के टिंकू भी घिघियाने लगा | क्या बोल रहा है, ओझा और उसके सागिर्दों के अलावा कोई नहीं समझ सकता था | “अच्छा तो तूँ है | बोल छोड़ता है या नहीं ? अभी तुमको तेस्तनाबूद कर देता हूँ | ठीक है, तूँ ऐसे नहीं मानेगा तो ये ले |” ओझा पास में रखी एक कुल्हाड़ी को हवा में नचाने लगा | यह सब देख कर टिंकू और डर गया और बोलने लगा, “नहीं, नहीं” | ओझा जोर से हँसा और कहने लगा, “ले आ अमानत ले आ” | तुरंत ही एक गुर्गे ने पास में बंधी खंसी को मालाफूल पहना कर, तिलक से सुसज्जित कर आग के सामने हाज़िर कर दिया |

अब क्या था, ओझा उठा | लपलपाती कुल्हाड़ी उठाई और हवा में लहराते हुए बकरे की गर्दन पर रख दी | एक पल को लगा कि बकरा तो गया, पर ऐसा हुआ नहीं | बकरा बच गया | विजयी मुद्रा में ओझा ने दोनों हाथ ऊपर उठाया और जय भूतनाथ, जय भूतनाथ का जयघोष करने लगा | गुर्गों ने टिंकू को हलके से थपथपाया और मुँह पर पानी के छीटें मारे | फिर ओझा ने टिंकू की पीठ थपथपाई और कहा, “टिंकू अब बिलकुल ठीक है” | रमेसर और रामकली ने भी राहत की सांस ली | आज रात का कार्यक्रम समाप्त हुआ पर रामकली का नहीं | श्रीमान ओझा ने रामकली से कहा, “बिटिया, यह बकरा तो बच गया, अब इसकी बलि भी नहीं दी जा सकती और न ही इसे किसी अन्य को बेचा जा सकता है | इसे तो मजबूरन मुझे ही रखना पड़ेगा और सुरक्षित भी रखना पड़ेगा कम से कम एक साल तक | तुम्हें टिंकू की परवरिश करनी पड़ेगी और मुझे इस बकरे की | इसका कम से कम एक हज़ार रुपया तो लगेगा अन्यथा कुछ भी अनिष्ट हो सकता है |

मरता क्या न करता | रामकली मान गई | मानती भी क्यों न ? टिंकू की जान अब बकरे की जान से जो जुड़ चुकी थी | बकरे की खैर में ही टिंकू की खैर थी | सवेरे ओझाजी के बकरों की जमात में एक और बकरा शामिल था | गाँव में मूंछों पर ताव देते ओझाजी हाँथ में बांस की एक सुटकुन थामे बकरों को बहोर रहे थे और दूर शिवसागर में मटरू मनी आर्डर भेजने की जद्दोजहद में |           

Tuesday, 26 June 2018

रिक्शावाला




रिक्शावाला
-राय साहब पांडेय

“गिरिए”, रिक्शेवाले ने कहा | फिर भी मैं बैठा ही रहा | “गिरिए बाबू”, रिक्शेवाले ने फिर दोहराया | अब समझा गिरिए का मतलब | ओह! उतरने के लिए बोल रहे हैं महाशय | क्या करता? गिर गया, बिना चोटिल हुए | सोचने लगा कि हिंदी भाषी होने से ही हिंदी का ज्ञान हो जाय यह जरूरी नहीं | खैर, बरुआ भवन आ गया था और फिलहाल तो अपनी मंजिल भी यही थी |

जी हाँ,शिवसागर की ही बात कर रहा हूँ, जहाँ शिव डोलों की कोई कमी नहीं है | अब यह दक्षिण का रामेश्वर तो है नहीं कि यहाँ समुद्र के किनारे भगवान् राम के मन में “करिहौं इहाँ शम्भु थापना, मोरे हृदय परम कल्पना” की भावना जागी हो | पर ऐसी ही कल्पना निश्चित रूप से अहोम राजाओं और रानियों के मन में अवश्य जागी होगी | तभी तो रानी अम्बिका ने अपने पति स्वर्गदेव शिवासिंघा की याद में  सन् 1734  में शिवसागर बोरपोखरी (तालाब)का निर्माण करवाया | इस तालाब की मुख्य विशेषता है कि इसका जल स्तर शहर के स्तर से ऊँचा है | इसी तालाब के किनारे, शिव डोल, शिव का एक भव्य मंदिर स्थित है | ऐसा कहा जाता है कि यह उस समय का सबसे ऊँचा मंदिर है जिसकी ऊँचाई लगभग 32 मीटर तथा परिधि 59 मीटर है | मंदिर 8 फीट स्वर्ण गुंबद रुपी कलश से सुशोभित है | इस परिसर में ही दो और मंदिर हैं जो विष्णु और देवी डोल के नाम से प्रतिष्ठित हैं | यह मंदिर असम का ही नहीं वरन पूरे उत्तर-पूर्व का सिरमौर है और इस शहर के किसी भी भाग से आसानी से देखा जा सकता है | शिव मंदिर और इस बड़े तालाब के होने के नाते ही इस शहर का नाम शिवसागर पड़ गया | पहले जब अहोम राजाओं ने इसे अपनी राजधानी बनाई तब इसका नाम रंगपुर था फिर बाद में सिबपुर हो गया | रंगपुर से पहले इसे मेटका के नाम से जाना जाता था | शिवसागर से पांच किलोमीटर की दूरी पर ही एक और बड़ा तालाब है जिसका नाम जोयसागर तालाब है और यह मनुष्यों द्वारा निर्मित भारत का सबसे बड़ा तालाब है जिसे सन् 1697 में अहोम राजा स्वर्गदेव रूद्रसिंघा ने अपनी माँ जोयमती की स्मृति में रंगपुर में बनवाया था | इस तालाब के किनारे भी शिव डोल के अतिरिक्त अनेक मंदिर हैं जो हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं |


अस्सी और नब्बे के दशकों तक सारे साइकिल रिक्शावाले मूलतः बिहार के ही होते थे | वस्तुतः रिक्शा चालक हों या नाई, धोबी, मोची हों, या छोटे-मोटे होटल चलाने वाले हों, इन सारे कामों पर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से आ कर बसे हुए प्रवासियों का ही एकाधिकार है | बिहार से आए रिक्शावाले ज्यादातर मोतिहारी जिले के मूल निवासी हैं | शिवचरन उर्फ़ मटरू भी रोजी-रोटी की तलाश में या यूँ कहें कि अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए ही एक दिन तिनसुकिया मेल पकड़ कर इस छोटे किन्तु नामचीन टाउन में गिर गए थे और अब हम जैसे लोगों को भी गिरा रहे थे- साइकिल रिक्शा से |


मटरू से मिलना मात्र एक संयोग हो सकता था, अगर शिवसागर भी मुंबई या दिल्ली जैसा बड़ा शहर होता | शिवसागर जिला मुख्यालय होने के बावजूद एक छोटा क़स्बा ही था | इसलिए भी मटरू और उनके जैसे अनेक लोगों से बार-बार मिलने की संभावना काफी प्रबल थी | हुआ भी ऐसा ही | दिखू पर बने एक पुराने दलंग (पुल) के उस पार मटरू रहते थे और इस पार हेमकोष प्रेस के पीछे मैं अपने परिवार सहित किराए पर रहा करता था | यद्यपि यह पुल बड़ी गाड़ियों के लिए वर्जित था, फिर भी इस पर काफी यातायात होता था | मटरू इस पुल से तक़रीबन एक किलोमीटर दूरी पर एक झोंपड़े में रहते थे | उनका मकान मालिक एक नेक इंसान था जो दशकों पहले पूर्वी बंगाल से विस्थापित हो यहाँ बस गया था | मेरी तरह ही मटरू को उनका मकान मालिक भी एक दिन मिला था और रहम खा कर इन्हें रहने के लिए अपने आहाते में ही जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा दे दिया था | उस जगह पर बांस की फलटी गाड़ कर मटरू ने अपनी झोंपड़ी तैयार की थी | बांस की फलटियों पर अन्दर और बाहर से मिटटी और गोबर का गाढ़ा लेप लगाकर सुखाने के बाद ही उसकी छत तैयार की जा सकती थी | छत के लिए टिन या एस्बेस्टस शीट का इंतजाम नहीं था | असम में केले और नारियल के पेड़ों की कोई कमी नहीं है | हर घर के आगे-पीछे ये पौधे होते ही हैं | केले और नारियल के सूखे पत्तों से झोपड़ियों की छत बनाना कोई ख़ास मुश्किल काम नहीं | मटरू भी इस कला में माहिर थे | मटरू के सर पर भी अब एक छत थी, जो उन्हें कम से कम साधारण ठण्ड और छोटी-मोती बारिश से बचा तो सकती ही थी |


आते-जाते मटरू से मुलाकात हो ही जाती थी | जब भी दिख जाते, रिक्शा चलाते हुए ही हाथ ऊपर उठा कर अभिवादन करना नहीं भूलते | एक दिन मोर्निंग शिफ्ट कर साईट (ऑफिस) से लौट रहा था | जैसे ही हेमकोष प्रेस के पास पहुँचा, अचानक से मेरी निगाह एक उलटे पड़े रिक्शे पर पड़ी | बगल में मटरू गिरे पड़े हैं | एक मिनट को कुछ समझ नहीं आया | सोचा टक्कर हो गई होगी और सामने वाला भाग गया होगा | मुझे देखते ही मटरू की जान में जान आई | मटरू अगल-बगल ताकते हुए उठने की कोशिश करने लगे | उस समय उनका पसीने से नहाया भयाक्रांत चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे अचानक किसी के सम्मुख शेर आ कर खड़ा हो गया हो | मैंने उन्हें आश्वस्त किया, फिर उनकी निगाह रिक्शे पर पड़ी | मैं समझ गया | हम दोनों ने मिलकर रिक्शे को पहियों पर खड़ा किया | मटरू कुछ बोल नहीं पा रहे थे | थोड़ी देर बाद उनके मुँह से आवाज़ निकली | मैंने धीरे से पूछा, “क्या बात है मटरूजी, क्या हुआ ?” “पैसा, पैसा”, मटरू ने मुँह खोलकर जैसे-तैसे बोलना शुरू किया | “भइया, इतनी दूर से धूप में रिक्शा चला कर लाया और पैसे के नाम पर एक चवन्नी फेंक दिया | मैंने बोला, बाबू दो रुपये तो दीजिये | बस फिर क्या, काटी दीम, भांगी  दीम के नारे के साथ हाथ-पाँव चालू | मार-मार के ई हाल कर दिया | रिक्शा का हाल तो आप देखिबे किया है”, मटरू सारी कहानी थोड़े ही लब्जों में कह डाली | मैं सोचने लगा कि श्रीमान् जी अगर किराया नहीं भी देते तो मटरू उनका क्या बिगाड़ लेता | मार-पीट क्यों ? जबकि असम का आम नागरिक सहृदय एवं बेहद अमन पसंद है | यह केवल अपवाद मात्र ही था |


भय का वह बीभत्स रूप आज भी मेरे मस्तिष्क को हिला देता है | अनायास सोचने लगा आखिरकार मटरू इतना भयभीत क्यों था ? उसने जरा भी प्रतिकार क्यों नहीं किया ? मुझे महसूस होने लगा, “भय का जुड़ाव जीते रहने की लालसा से जुड़ा है | घर में खुशहाली लाने की उम्मीद से भी जुड़ा है | परिवार और बच्चों के मुख पर मुस्कान से जुड़ा है | क्या इतनी आसानी से कह देने मात्र से कोई भी निर्भय हो जाता है ? भय मुक्त होना अपने आप में एक तपस्या है, यह केवल खुद के जीने या मरने तक सीमित नहीं है | हम रोज भयभीत होते हैं | अपनी बात नहीं कहते, लाग-लपेट से काम निकालते हैं | भय का लगाव समाज, देश और दुनियाँ के लगाव से जुड़ा है, उनके सम्मुख और विमुख होने से जुड़ा है | कबीर और उनके समाज से भी जुड़ा है | शायद इसीलिए भय-मुक्त और अभय होने के लिए लोग अपना परिवेश बदल लेते हैं | तो क्या इसे भय से मुक्त होना कह सकते हैं ? भय से स्वतंत्रता एक स्वप्न जैसा है, कम से कम एक गृहस्थ के लिए क्योंकि इसका सीधा संबंध जीने की स्वतंत्रता से जुड़ा है |”  

2: दिखू

शिवसागर दिखू के किनारे पर बसा एक छोटा पर ऐतिहासिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण क़स्बा है | महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि असम के इस भाग पर तक़रीबन 600 सालों तक शासन करने वाले अहोम शासकों की यह राजधानी हुआ करती थी | यह इस शासन काल की तमाम सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासतों का भी केंद्र हुआ करती थी | दिखू नदी इस क्षेत्र की जीवन रेखा है |   तिबतो-बर्मन भाषा में ‘दी’ का शाब्दिक अर्थ है जल या नदी और खो (हिंदी: खाई?, खोह ) का मतलब है तीब्र ढलान वाला, अर्थात दिखू एक तीब्र ढलान वाली नदी है | इस बारह मासी नदी का प्रादुर्भाव (उद्गम) नगालैंड के जुन्हीबोटो जिले की नुरुटो पहाड़ियों से होता है, जो समुद्र तल से लगभग 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, और मोकोकचुंग तथा लोंग्लेंग जिले से बहती हुई असम के मैदानी भागों में प्रवेश करती है और दिखोमुख पहुँच कर अंततः ब्रह्मपुत्र में समाहित हो जाती है | लगभग 256 किलोमीटर लम्बी इस नदी का तक़रीबन 150 किलोमीटर हिस्सा पहाड़ियों से होकर गुजरता है | नागिन की तरह बल खाती यह नदी नगालैंड की पहाड़ियों को छोड़ती हुई जिस मैदानी भूभाग में प्रवेश करती है उस स्थान को नागिनिमोरा के नाम से जाना जाता है | इस कस्बे का नाम ‘नगा रानी मोरा’ अर्थात “नगा रानियों का कब्रगाह’ के नाम पर नागिनिमोरा पड़ गया | साल भर पानी होने के कारण दिखू के जल का उपयोग नगालैंड के काफी बड़े हिस्से में खेतों की सिंचाई के लिए किया जाता है और यह मछलियों के रूप में भोजन का भी एक बड़ा श्रोत है | इसके अतिरिक्त इस  नदी का मनोरम दृश्य सैलानियों के लिए एक प्रमुख आकर्षण प्रस्तुत करता है | इस नदी को अन्य नामों से जाना जाता है जिसमे डोइकलॉन्ग, वशिष्ठ गंगा और दिक्सू ज्यादा प्रचलित हैं | यांग्यु और नानुंग दिखू की सहायक नदियाँ हैं | ब्रह्म्पुत्र की तरह ही इस नदी की प्रतिष्ठा एक नर नदी के रूप में की जाती है, जिसका जिक्र यहाँ के लोकगीतों में भी मिलता है |


जब भी तेज बारिश होती है, असम में तो अक्सर तेज बारिश ही होती है, दिखू के किनारे झुग्गी-झोपड़ियों में बसे लोग सबसे पहले बेघर हो जाते हैं | घर में कुछ ख़ास साजो-सामान न होने के कारण सभी उजड़े लोग नदी के तटबंध पर इकठ्ठा हो जाते हैं | फिर बारिश रुक जाती है और आस-पास के तमाम नागरिक उफनती दिखू का लुत्फ़ लेने नदी के किनारे आ जाते है | मटरू भी अक्सर इस तरह की बारिश के शिकार होते रहते थे | ऐसे ही माहौल में मैं एक दिन नदी के किनारे पहुँचा हुआ था | नदी के दोनों किनारों पर लोगों का मजमा लगा हुआ था | लोग खिलखिला रहे थे और आपस में कहासुनी भी कर रहे थे | एक बार तो मुझे लगा जैसे ये सभी लोग मछली पकड़ रहे हों | पर ऐसा नहीं था | नदी का यह तीब्र बहाव इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं था | सामने तट पर मेरी निगाह मटरू पर पड़ी | वे भी अपनी झोंपड़ी गवां कर लोगों के साथ इस खेल का आनंद ले रहे थे | बार-बार ‘पकड़ो-पकड़ो’ की आवाज से ऐसा लग रहा था जैसे अधिकांश लोग कुछ पकड़ने के प्रयोजन में मशगूल हैं | लेकिन क्या ? उत्सुकता बस मैंने साथी तमाशबीन से पूछ ही लिया, “भैया, ये लोग क्या पकड़ रहे हैं ?” उसने सामने नदी में बहते पेड़ और डालियों की ओर इशारा किया | सचमुच नदी अपने साथ क्या-क्या नहीं बहा रही थी | समूचे बड़े-बड़े पेड़, बांस, किनारे बसे बासिंदों की चारपाईयां और वह सब कुछ जो नदी के रास्ते में आ सकता था | नदी के बीचो-बीच बहने वाली कोई भी वस्तु पकड़ में नहीं आ सकती थी | फिर भी कुछ बड़े-बड़े लकड़ियों के लट्ठे और डालियाँ नदी में बहते-बहते किनारे लग ही जाती थीं | लोगों का सारा जोश इन्हें ही पकड़ने के लिए उमड़ रहा था | आखिरकार जो कुछ नदी बहा ले गई, वह तो वापस मिल नहीं सकता था पर नदी इतनी निर्दयी भी नहीं कि कुछ भी दे न सके | भविष्य में इन लकड़ियों का उपयोग खाना पकाने के अतिरिक्त खूबसूरत कलाकारी के लिए भी तो हो सकता है ! जो भी हो, इस अवसर का आनंद कुछ अलग ही होता है |


नदियाँ हमें जोड़ना चाहती हैं, हम इन्हें सीमाओं में बांध कर अपनी सीमाएँ निर्धारित करना  चाहते हैं | ये निर्बाध बहना चाहती हैं, हम इन पर बांध बनाना चाहते हैं | ये हमें निर्मल, साफ़-सुथरा जल देना चाहती हैं, हम इन्हें मल-मूत्र और गंदे नालों से कलुषित-दूषित और सड़ाना चाहते हैं | ये कुछ छीनती हैं तो बदले में बहुत कुछ दे जाती हैं | ये हमारे रास्ते में नहीं, हम इनके रास्ते में अवरोध उत्पन्न करते हैं | हम एक दूसरे से दूर रह कर भी इन नदियों के माध्यम से एक दूसरे की संपदाओं का उपभोग कर पाते हैं | तभी तो नगालैंड में पला-पोषा पेड़ असम के लोगों के रोजी-रोटी का माध्यम बनता है |

अब ठण्ड पड़ने लगी है | दिखू अपने तटबंध की सीमाओं में कैद है | इसके किनारे टहलना अपने आप में एक अनुपम आभास दिलाता है | ऐसे मौसम में इस नदी में नहाना और तैरना या किनारे बैठना ही अपने आप में एक अनुष्ठान से कम नहीं है | तैराकी में अकुशल वयस्क भी इस नदी को पार कर सकते हैं | तकरीबन एक मीटर गहरे पानी में कोई भी इस नदी में स्नान का आनंद ले सकता है |  




Friday, 18 May 2018

सकूर





सकूर
-राय साहब पाण्डेय 

आज सकूर चाचा बहुत याद आए,
उमर में चाचा लगते थे, पर मुसलमान थे,
कब नमाज पढ़ते किसी ने न जाना,
धुनते थे खूब धुनिया जो थे,
हम सब के लिए गद्दे और रजाई |


सकूर अब भी चाचा ही थे,
थोड़े और बुजुर्ग हो गए, अब भी मुसलमान ही थे,
पर अब वह सकूर भाई बन गए थे,
नमाज कब पढ़ी, अब भी किसी ने न जाना,
धुनिया थे पर अब धुनते नहीं थे,
जलाते थे पेट्रोमैक्स,शादी हो या हो सगाई |


सकूर अब भी चाचा ही होते थे,
अब काफी बुजुर्ग हो गए थे, अब भी वह मुसलमान ही थे,
पर अब वे न चाचा रहे और न ही भाई,
अब वे सकूर मियां हो गए थे,
धुनिया तो अब भी थे, पर अब वे न धुनते थे, 
न ही पेट्रोमैक्स जलाते थे,
अब वे दुआ देते थे, बन कर के सांई,
पाने को मुट्ठी भर दाना, हो कोई भी, हिन्दू या इसाई |


सकूर अब भी चाचा ही हैं, पर सबके लिए नहीं,
अब वे इस दुनियाँ-जहाँ में नहीं, 
बसते हैं दिलों में पर सबके नहीं,
समरसता है जिनमे, ज़ज्बात है जिनमे और 
मुकम्मल ईमान है जिनमे,
उनके लिए सकूर न ही थे धुनिया और न ही मुसलमान,
न ही बत्तीवाला और न ही कोई साईं-फ़कीर,
जिसकी उठती थी लकुटी दुआ के लिए,
बस एक नेक बंदा, एक नेक इन्सान |












Wednesday, 9 May 2018

निर्गुन -एक भजन





निर्गुन – एक भजन

-राय साहब पाण्डेय 
इहलोक परलोक का बंधन,
एक तार का बस गठबंधन,
आती जाती तब तक माया,
   बटोही रे इतना क्यों इठलाया?  

बुद्धि, विवेक का दंभ जताया,
कह सुन अपना और पराया,
खुद रोया और इतर रुलाया,
पथिक रे इतना क्यों इठलाया?

व्यर्थ ग़रूर करे जिस पर तूँ ,
लवनी रूप अरु कंचन काया,
माटी  थी माटी में मिल गई,
राही रे इतना क्यों इठलाया?

गफ़लत में ही उमर कट गई,
 सोचूँ, क्या खोया ? क्या पाया?
 भाया, मिले राम ना  माया,  
मुसाफिर इतना क्यों इठलाया?