Saturday, 16 March 2019

टिंकू का मुंडन


टिंकू का मुंडन
-डॉ राय साहब पाण्डेय 
ओझा की कृपा कहें या चिकित्सक की दवा का परिणाम, टिंकू की सेहत सुधर गई है | टिंकू अब बड़ा हो रहा है |  छह साल का कब का हो चुका | माँ रामकली को टिंकू के स्कूल में दाखिले की चिंता सताने लगी है | पर इसके पहले टिंकू का बाल उतरवाना होगा और वह भी माता के धाम में |

नवरात्र से अच्छा मुहूरत और क्या हो सकता है? मटरू को मुहूरत से पहले ही घर जाना होगा | सारा प्रोग्राम पहले से ही तय होने के कारण मटरू ने टिकट का इंतजाम कर रखा था | अब ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों में पैसा तो खर्च होता ही है, मटरू भी काफी पहले से पैसे इकठ्ठा करने में लगे हुए थे | मटरू के दोस्त राम अगर्दी भी साथ जाने के लिए तैयार हो गए | जो कुछ नोट कमाए थे उसे कपड़े के एक पट्टे में सिल कर कमर में बांध लिया | नोट तो सुरक्षित हो गए, अब पेट के लिए इंतजाम बाकी था | दो दिन की यात्रा के लिए केवल सत्तू से काम न चलने वाला था | चने, चबैने के साथ गुड और नमकीन भी रख लिया | रास्ते में पानी के लिए बार-बार स्टेशन पर उतरने की झंझट कौन पाले, इसलिए पंद्रह लीटर वाला एक कनस्तर भी साफ़ कर सुरक्षित रख लिया | पानी तो घर से निकलने के पहले ही भरा जाएगा |

बाहर गाँव की एक्सप्रेस और मेल गाड़ियाँ शिवसागर से नहीं छूटती थीं | इन गाड़ियों को पकड़ने के लिए तो शिमलगुड़ी जंक्शन ही जाना पड़ता था | तिनसुकिया मेल रात के नौ बजे के करीब शिमलुगुड़ी पहुँचती थी | शिवसागर से शिमलुगुड़ी लगभग पंद्रह किलोमीटर पड़ता है | राम अगर्दी का घर स्टेशन से नजदीक था | मटरू दोपहर में ही राम अगर्दी के घर आ गए और वही से पसिंजर पकड़ कर शिवसागर जाना तय हुआ | स्टेशन पर मटरू के कीर्तन वाले कुछ और दोस्त उन्हें छोड़ने और विदाई देने भी आ गए | कुछ तो पोस्ट-कार्ड और अंतर्देशी भी मटरू को अपने घर के नजदीक डाक में छोड़ने के लिए दे रहे थे जिससे उनकी चिट्ठी उनके घर वालों तक जल्दी पहुँच जाय | छुक-छुक करती पसिंजर गाड़ी शिवसागर के निर्जन स्टेशन पर आ गई | जल्दी-जल्दी में सबने एक-दूसरे से दुआ-सलाम किया और ट्रेन प्रस्थान कर गई |

आधे-पौने घंटे में ही ट्रेन शिवसागर स्टेशन पहुँच गई | सामान सुरक्षित उतार कर मटरू और  राम अगर्दी एक बेंच पर आ कर बैठ गए | तिनसुकिया मेल आने में अभी काफी टाइम था | राम अगर्दी प्लेटफार्म पर चहल कदमी कर रहे थे तभी प्लेटफार्म पर आवाज आई, “यात्री गण कृपया ध्यान दें | आज तिनसुकिया मेल में आरक्षित डिब्बे नहीं लगे हैं | यात्री गण यदि चाहें तो टिकट वापस कर अपना पैसा प्राप्त का सकते हैं |” अगर्दी हाँफते हुए मटरू के पास आए | मटरू थोड़ी देर चुप रहे, “फिर बोले, देखा अगर्दी मैं कहता था न रिजर्वेशन मत कराओ | हमें चालू डिब्बे में ही सहता है | पहली बार तो रिजर्वेशन कराया लेकिन यह भी नसीब में नहीं लिखा था |” राम अगर्दी बोले कोई बात नहीं अब आगे की सोचो | सोचना क्या है, चलना तो है ही, जैसे तैसे घुसेंगे | कम से कम न्यू बोंगाईगाँव  से तो रिजर्वेशन मिल जाएगा | एक दूसरे से बात कर के दोनों ने अपने आप को ढाढस बंधाया | ट्रेन आने में अभी भी काफी वक़्त था | सामान उठाकर एक चाय की दूकान पर पहुँच गए और चाय की चुस्की लेने लगे |

समय को तो बीतना ही था सो बीत गया | ट्रेन स्टेशन पर आ कर खड़ी हो गई लेकिन सारे चालू डिब्बे प्लेटफार्म से दूर अँधेरे में थे | ट्रेन के दरवाजे से घुसना नामुमकिन लग रहा था | मटरू खिड़की से अन्दर घुसे, अगर्दी ने किसी तरह सामान अंदर फेंका और खुद खिड़की में फंस गए | अन्दर से मटरू और बाहर से पब्लिक की जोर आजमाइस के बाद राम अगर्दी धड़ाम से गाड़ी के फर्श पर गिरे | भगवान का शुक्र कहें या अच्छी किस्मत का खेल, चोट नहीं आई | पहले से सीट हथियाए बैठे लोगों से चिरौरी-विनती काम आई और पीठ सीधी करने की जगह मिल गयी | एक किला फतह हुआ, दोनों ने राहत की सांस ली | एक दूसरे की तरफ देखा और मुस्कुराए | पल भर में टेंशन गायब | इस तरह से गाड़ी में चढ़ना इन दोनों के लिए कोई नई बात तो थी नहीं, हाँ रिजर्वेशन वाले डिब्बे में बैठते तो जरूर नई बात होती |
खाली पेट झपकी लेते हुए तथा एक दूसरे पर गिरते पड़ते रात बीत गई | रंगिया होते हुए ट्रेन न्यू बोंगाईगाँव स्टेशन पर धमकी | बड़ी लाइन वाली गाड़ी के खुलने में अभी समय था |  दोनों दोस्तों ने अपना सामान उठाया और पूछते-पाछते वेटिंग हॉल में दाखिल हो गए |  यहाँ भी मुंह धोने से लेकर नित्य क्रिया के प्रत्येक स्तर पर लाइन |  खैर, मशक़्क़त तो करनी पड़ी लेकिन अंततः नित्य क्रिया से फ़ारिग हो ही गए | चाय के बाद सत्तू लपेटा और फिर अगली यात्रा के लिए तैयार | 

राम अगर्दी और मटरू ने पहली बार रिज़र्व डिब्बे में कदम रखा | डिब्बा तो साफ़-सुथरा था लेकिन चालू डिब्बे वाले कोलाहल की कमी थी | यहाँ की शांती अच्छी नहीं लग रही थी | अगले दिन सुबह दस बजे ट्रेन पटना स्टेशन में दाखिल हो गई | इधर का इलाका मटरू के लिए जाना पहचाना था, इसलिए मटरू काफी आश्वस्त थे | केसरिया जाने के लिए पसिंजर गाड़ी आने में वक़्त था | दोनों ने निश्चय किया कि आगे का सफ़र अब बस से ही निपटाया जाय | तकरीबन सौ किलोमीटर की बस यात्रा के लिए दोनों रिक्शा चालक अब रिक्शा पर सवार थे | सौभाग्य से मीठापुर बस स्टैंड पर बस केसरिया जाने के लिए तैयार खड़ी थी | कुछ भी हो, बस से घर जाने का उत्साह, बस में अपने लोगों के बीच बैठ कर बात करने का अपना ही उमंग होता है | बात-चीत करते और बस की खिड़की से गाँव-जेवार का नज़ारा देखते हुए अपने चिर-परिचित बस स्टैंड पर पहुँचने का उतावला पन मटरू की आँखों में साफ़ झलक रहा था |

टिंकू लट्टू नचा रहा था | रमेसर ने आवाज लगाईं, ”टिंकुआ तुम्हारे पापा आने वाले हैं, हमेशा बस से ही आते हैं चलेगा लेने?” टिंकू ने लट्टू एक तरफ फेंका, मामा के साथ बस स्टेशन के लिए तैयार | रामकली और मटरू की माँ घर पर बेटे तथा मेहमान के स्वागत के लिए व्यस्त हो गए | पहली बार दूर-दराज इलाके से मटरू का कोई दोस्त घर आ रहा है, कुछ ख़ास व्यंजन तो होना ही चाहिए | टिंकू और रमेसर बस अड्डे पर दाखिल हो गए, लेकिन बस का क्या? इसका कोई समय थोड़े न होता है | अक्सर लेट ही रहती है | पूछने से कोई फायदा तो होने से रहा | फिर भी डरते-डरते पूछ-ताछ वाली खिड़की पर पहुँच ही गए रमेसर | “अभी कोई खबर नही है, आने की खबर होने पर अनाउंस कर दिया जाएगा |” अपना सा मुँह लेकर लौट आये रमेसर | टिंकू के साथ बैठ कर इंतजार करने के अलावा और क्या कर सकते थे? “अरे रमेसर यहीं बैठे रहोगे क्या? बस आये तो दस मिनट हो गए, मुझे तो कंडक्टर से बाकी के पैसे लेने में टाइम लग गया | ये कंडक्टर लोग भी न जान-बूझ कर पैसा रोक कर रखते हैं ताकि पसिंजर भूल जाय और बाकी का पैसा उनकी जेब मा”, मटरू ने रमेसर को देख कर कहा | हड़बड़ाहट में रमेसर को समझ ही नहीं आया कि क्या कहें पर राम अगर्दी सब समझ गए | पैलगी-अशीष के बाद मटरू बेटे की तरफ झुके औए गोद में उठाया | दुलार से पूछा, “अब कैसे हो बेटवा और बेटे के सर पर लम्बे लहराते बाल निहारने लगे |”

थोड़ी देर में सभी लोग घर पर थे | मटरू की माँ दरवाजे पर ही मिल गई | पाँव छू कर मटरू और राम अगर्दी ने माँ से आशीर्वाद लिया | राम कली दरवाजे के पीछे से पति को देख रही थी, पर अभी उसका वक्त नहीं था | जल-जलपान के बाद स्नान-ध्यान और फिर भोजन-छाजन | शाम को बैठ कर मुंडन के बारे में सलाह-मशविरा करने लगे | दो दिन बाद मुंडन कराने का फैसला लिया गया |

टिंकू आज बेहद खुश था | दोस्तों के साथ खेलकूद के बाद वह अपने दो साथियों के साथ बगल के पम्पिंग सेट वाले नलकूप पर नहाने गया | आज उसके हाथ में खुशबू वाला नया ‘जय’ साबुन था | साबुन देखते ही दोनों दोस्त हाथ में ले कर जोर-जोर से सूंघने लगे | शुक्र है यह साबुन ही था वरना पूरी बट्टी ही खा जाते | श्यामू ने सकुचाते हुए पूछा, “टिंकू, मुझे भी नहाने के लिए साबुन देगा |” “हाँ, क्यों नहीं, जरूर दूँगा पर बस एक बार”, टिंकू ने फ़ौरन हामी भर दी | तीनो दोस्त नलकूप की टंकी पर नहाने लगे | सबसे पहले टिंकू ने ‘जय’ का उदघाटन किया | और डुबकी लगाने लगा | फिर श्यामू और सुन्दर की बारी आई | साबुन से नहाने का अद्भुत आनन्द पहली बार मिल रहा था | टिंकू को बार-बार साबुन लगाते देख श्यामू और सुन्दर भी अपने लोभ पर काबू नहीं कर पा रहे थे | दोनों ने एक जुगत लगाई | वे बार-बार टिंकू को पानी के अंदर देर तक डुबकी लगाने के लिए उकसाने लगे और जब तक वह पानी के अन्दर सांस रोक कर बैठा रहता उसके दोस्त जल्दी-जल्दी साबुन लगा लेते और फिर पानी के अन्दर बैठ जाते | यह सिलसिला कई बार चलने के बाद आखिर में टिंकू दोनों की चाल समझ गया | उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया और मन ही मन दोनों की धूर्तता को कोसने लगा | घर लौटते समय वह यही सोचता रहा कि उसके दोस्त अगर उससे पूछ कर साबुन लगाते तो वह मना थोड़े ही करता | उसके लिए जीवन में चालाकी का यह पहला सबक था |

कल सवेरे मुंडन के लिए माता के धाम में जाना था | टिंकू की माँ और दादी ने सारा इंतजाम कर रखा था | पड़ोस की दो छोटी लड़कियों को भी साथ ले लिया गया | पुस्तैनी नाई तो इस नवरात्रि में धाम में ही डटा रहता था | माता के धाम में पंडों और मालियों का एकाधिकार था | मंदिर के आहाते में कई कतारों में क्रम से मिटटी के चूल्हे बने हुए थे, जो मालियों के रख-रखाव में थे | प्रत्येक चूल्हे का कुछ न कुछ किराया देना होता था | इसके लिए कोई निश्चित रकम तय नहीं थी | असामी देख कर रकम का मोल-भाव हो जाता था | मोटे असामी उम्मीद से ज्यादा ही दे दिया करते थे | टिंकू को पहले माता का दर्शन करवाया गया | माँ रामकली ने बड़े प्यार से बेटे के लम्बे लहराते बालों में अपना हाथ फेरा और बेटे को गले से लगाया | अब चुन्नन की बारी आई | उस्तरा तेज करने के बाद धीरे से मुस्कुराते हुए टिंकू की दादी से बोले, “काकी कुछ नेग-सगुन तो निकालो, पोते का मुंडन है | छूछ में उस्तरा आज नाहीं चलेगा |” दादी ने टिंकू की माँ की तरफ देखा और चुन्नन को कोसने लगी, “चल हट निगोड़ा कहीं का, कब तूने छूछ में कोई भी शुभ काम किया है रे? बस जो मन में आएगा, बोल देगा |” रामकली सकुचाते हुए अपने बटुए से दस-दस रुपये के दो नोट निकाले और चुन्नन के पहले से ही फैले हुए धारी-दार लाल अंगौछे में डाल दिए | कहते हैं नाईयों के पास छत्तीस बुद्धी होती है | चुन्नन अरसे से यही काम करता आ रहा था | जजमान की रग-रग से वाकिब था | “अरे काकी आपौ तो कुछ टेट हल्का करौ | ई तो भाभी डाली हैं | टिंकू की दादी भी इन्हीं रशमो-रिवाज में पली-बढ़ी थीं | इस बार उन्होंने कोई हँसी-मजाक नहीं किया | धोती के पल्लू का टोंक खोला और एक-एक रुपये के दो नोट टिंकू के सर के ऊपर घुमा कर चुन्नन के मुँह बाए अंगौछे में डाल दिया | मटरू और राम अगर्दी वहीँ जमीन पर बैठ कर यह सब कलाप देख रहे थे | चुन्नन जानता था कि मटरू तो इसमें कुछ डालने वाला नहीं है, उसने अपना अंगौछा फ़ौरन समेट लिया | चुन्नन की उंगलियाँ टिंकू के सर पर पानी के साथ फुर्ती से फिरने लगीं | बाल गीला और मुलायम होने के बाद चुन्नन ने मुंडन शुरू कर दिया | टिंकू की कोई बुआ नहीं थी इसलिए बाल रोपने का काम साथ आई दोनों लड़कियों ने कर दिया | टिंकू की माँ ने उन्हें भी नेग दिया | चुन्नन ने टिंकू के सर पर सरसों का तेल लगाया | बाल उतरवाने के बाद टिंकू सबका पैर छू कर आशीर्वाद लिया | पूड़ी-हलवा माताजी को चढ़ाने के बाद सबने प्रसाद ग्रहण किया |

दिन ढलने से पहले ही सब लोग घर आ गए | लेकिन मुंडन अभी समाप्त नहीं हुआ था | टिंकू की माँ सबसे बचते-बचाते पूड़ी-हलवा एक प्लेट में सजाकर घर से निकल गई | मटरू को शक हुआ | जब रामकली को लौटने में देर होने लगी तो तो मटरू का शक यकीन में बदलने लगा | रामकली ओझा के घर पहुँच गई | ओझाइन दरवाजे पर ही मिल गईं | रामकली हलवा-पूड़ी ओझाइन के हवाले कर ही रही थी कि उसी समय ओझा महोदय का पदार्पण हो गया | ओझा को हलवा पूड़ी में कोई विशेष रुचि नहीं थी | मांस-मच्छी खाने वाले के लिए इस सबका कोई खास मायने नहीं था | उसके मन में कुछ और चल रहा था | सामने बंधे हुए कई जोड़े बकरे आपस में ही जोर आजमा रहे थे | नजदीक जा कर ओझा ने रामकली को एक मुड़ी हुई सींग वाले बकरे की तरफ ऊँगली दिखाते हुए कहा, “बिटिया, देखो न कितना बड़ा हो गया है? इसको संभालना मुश्किल हो रहा है | खुराक भी बढ़ गई है | अगर तुमने कुछ नहीं किया तो इसका प्रसाद ही बनाना पड़ेगा |” रामकली सोचने लगी, “अभी तो यह बकरा दो महीने पहले मिमिया रहा था, इतने जल्दी कैसे इतना बड़ा हो गया?” ओझा ताड़ गया | झट से बिना रुके एक सांस में बोला, “क्या सोच रही हो बिटिया? यही न कि इतने जल्दी कैसे इतना बड़ा हो गया? इसका बड़ा होना ही तो टिंकू की सेहत सुधरने का प्रमाण है | अभी इसको साल भर और पालन पड़ेगा और फिर...|”

रामकली हकलाने लगी | किसी तरह हिम्मत जुटा कर बोली, “देखती हूँ काका |” और वहां से तुरंत ही निकाल गई | ओझा अपना वार चल चुका था | रामकली तमाम आशंकाओं के बीच अपने बोझिल पैरों को घर की तरफ घसीटने लगी | “बिना बताए चली आई, अब तक तो उन्हें पता भी चल गया होगा, क्या कहूँगी?”, सोचते-सोचते रामकली घर पहुँच गई | सौभाग्य से मटरू उस समय राम अगर्दी के साथ पड़ोस के लोगों से मिलने गए हुए थे | रामकली ने अपनी सास को सारा वाकया बता दिया | “तूँ मत घबड़ा, मैं मटरू और ओझा दोनों को संभाल लूंगी”, सास ने बहू रानी को आश्वस्त किया | मटरू और राम अगर्दी थोड़ी देर बाद आ गए | मटरू कुछ पूछते इसके पहले माँ ने बताया कि उसने ही माता के धाम का प्रसाद ओझा के परिवार के लिए भिजवाया था | मटरू इसके बाद क्या कहते | वे जानते थे कि अम्मा अगर एक बार फट पड़ी तो लेने के देने पड़ सकते हैं | शांत रहने में ही भलाई समझी | मेहमान के सामने बखेड़ा खड़ा करना उचित नहीं था |

भोजन तैयार था | मटरू और राम अगर्दी के भोजन कर चुकने के थोड़ी देर बाद मटरू की अम्मा दोनों के पास आईं और इसके पहले वह कुछ बोलती राम अगर्दी बोले, “अम्मा परसों वियय दशमी है | मैं चाह रहा था कि कल गाँव चला जाऊं |” अम्मा कुछ मिनट के लिए चुप हो गईं फिर बोली, “बेटवा हम तो चाहत रहे कि इहाँ का मेला देख के जाओ लेकिन तुम्हरा भी घर-पलवार है | तुम्हरी भी अम्मा है, जोरू है, बाल-बच्चे हैं, हम कैसे रोक सकत हई |” राम अगर्दी अम्मा की सूझ-बूझ के कायल हो गए | थोड़ी देर सब शांत रहे | फिर मटरू ने पूछा, “अम्मा तुम कुछ कहै चाहत रही है, बताओं न क्या बात है?” अम्मा मटरू के सर पर हात फेरते हुए बोली, “बेटवा, तुम तकदीर वाला है जो तुमको रामकली जैसी जोरू मिली है |” अम्मा कुछ आगे बोलती कि मटरू बोल पड़े, “यही कहे खातिन इतना प्यार दिखा रही है |” “नहीं रे, रामकली ओझा के यहाँ परसाद ले के गई थी, पर वो निगोड़ा तो कुछ और कहानी बना रहा है | बहू जब से ओझा के घर से आई है बहुत परेशान लग रही है |” मटरू ने अम्मा को ढाढस बंधाया और बोला- “अम्मा अब जा कर सो जाओ, कल ओझा से निपट लेंगे |

मटरू और राम अगर्दी ने आपस में आगे इस विषय पर कोई विमर्श नहीं किया और सो गए | दोनों तड़के उठ गए | स्नान-ध्यान से फ़ारिग होने के बाद दही-चिवड़ा का नाश्ता किया और बस स्टेशन की तरफ चल पड़े | लेकिन राम अगर्दी के मन में कुछ और चल रहा था | वे बस स्टेशन के विपरीत वाले रास्ते की तरफ मुड़े और बोले, “थोड़ा ओझा जी से आशीर्वाद ले लेते हैं |” मटरू राम अगर्दी के स्वभाव से परिचित थे | उन्हें आशंका हुई, आज कुछ तो करेगा यह | न चाहते हुए भी मटरू के कदम उसी राह पर चल पड़े | थोड़ी देर में ही दोनों ओझा के दरवाजे पर थे | ओझा उस समय मुँह में दातुन डाल कर चबा रहा था | मटरू ने बड़ी अदब से ओझा जी से राम-राम कही | ओझा ने भी उसी खुशमिजाजी से मटरू का अभिवादन स्वीकार किया | ओझा ने राम अगर्दी का भी परिचय प्राप्त किया | राम अगर्दी का सामान मटरू के पास था | राम अगर्दी लपक कर आगे बढ़े, मोटी और मुड़ी सींग वाले बदबूदार बकरे का पगहा खूँट सहित उखाड़ लिया | एक हाँथ में बकरे का पगहा और दूसरे में खूँटा ले कर चलते बने और मटरू को भी चलने के लिए आवाज लगाई | “हाँ-हाँ, यह क्या कर रहो हो”, मटरू और ओझा दोनों ने एक साथ जोर से पुकारा | जब तक दोनों कुछ समझते, राम अगर्दी ओझा के घर से काफी दूर जा चुके थे |

राम अगर्दी वहीँ रुक गए | दरअसल उनका मकसद ओझा के घर पर कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं था | वह तो उसे सबक सिखाना चाहते थे | ओझा अपने मुँह में आई नीम की कड़वी पीक निगला और दातून फेंक राम अगर्दी के पास पहुँच गया | इसके पहले कि वह कुछ बोलता राम अगर्दी बोल पड़े, “मटरू भैया, हमारे बैग में एक लम्बा सा चाकू है उसे निकालिए | इस बकरे का परसाद बनाना है और इस ओझा के मुँह में ठूस-ठूस कर इसका परलोक सुधारना है | क्यों? यही कहा था न तुमने भाभी से? अभी तुम्हें मजा चखाता हूँ | कामचोर कहीं का | भोले-भाले लोगों को फँसाते हो, इतनी बेशर्मी कहाँ से सीखी है? कहो तो चलता हूँ तुम्हारी जोरू के पास और उसे तुम्हारी सब करतूत बताता हूँ | जितने पैसे तुमने लिए हैं शराफत से वापस कर देना वरना पुलिस भले छोड़ दे, मैं नहीं छोडूंगा |” दूसरों को डराने वाला ओझा आज इस कदर डर जाएगा, उसने कभी नहीं सोचा होगा | ओझा ने मटरू के आगे हाँथ जोड़ लिए | राम अगर्दी भैया, अब जाने दो | इसको अपने किये की सजा मिल गयी है | खूँटा और पगहा दोनों एक साथ फेंकते हुए राम अगर्दी ने ओझा के सामने उसके लटके मुँह पर राम-राम कही और मटरू के साथ चल दिया | बस स्टेशन पर पहुँच कर दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक जोरदार ठहाका लगाया | ओझा के पाँव में मानो चकरी सिल गई हो | आतंकित और भारी मन से एक हाँथ में खूँटा और दूसरे में बकरे का पगहा पकड़ अपने घर आ गया |

आज विजय दशमी है | टिंकू उत्साह में है | क्यों न हो अपने पापा के साथ मेला जो देखने जाना है | कुछ भी हो आज के दिन पूड़ी, तरकारी, रसादार भांजी और सेवई या खीर तो मिलेगा ही | त्यौहार हो या कोई अन्य प्रयोजन, अधिकतर समय खाने-पीने और स्वागत-सत्कार में ही निकलता है | महिलाओं का तो जनम ही इसी काम के लिए हुआ है | टिंकू की माँ और दादी भले ही विजय दशमी के मेले में न जाँय पर त्यौहार की सारी तैयारी इनकी ही जिम्मेदारी है | आज भी शुभ दिन है ऐसा मान कर दादी ने मटरू को पंडित जी के पास भेंज दिया | आखिरकार टिंकू कब तक टिंकू रहेगा | उसका भी अपना एक नाम होना चाहिए | घर के नाम के अतिरिक्त स्कूल का भी नाम चाहिए | टिंकू बिना नाम लिखाए ही कभी-कभार स्कूल चला जाता था | थोड़ा बहुत अक्षर भी पहचान लेता था | स्कूल में उसका नाम लिखाना अब जरूरी हो गया था | मटरू भले ही ख़ास पढ़ा-लिखा नहीं था लेकिन ज्ञान का महत्तव वह भली-भांति समझता था |

आज सचमुच टिंकू का ही दिन था | मटरू टिंकू के नामकरण के लिए पंडित जी के पास गए थे और इस बीच ओझा मटरू के घर आ धमका | मटरू की दादी को आवाज लगाई:
ओझा: अरे, मटरू की अम्मा कहाँ हो?
दादी: कौन है? टिंकू जरा देखो तो |
टिंकू: ओझा बब्बा हैं, दादी |
ओझा का नाम सुनकर दादी मन ही मन सहम गई | रामकली भी सकते में आ गई | पता नहीं यह निगोड़ा सवेरे-सवेरे क्यों आ धमका | मटरू भी घर पर नहीं है | गीला हाथ अपने साड़ी में पोछते हुए दादी बाहर आ गई |
दादी: का हुआ सोखा? इधर का रास्ता कैसे भुला गए सवेरे-सवेरे |
ओझा: बस ऐसे ही मन हुआ आप लोगन से मिल लेते हैं, सो आ गए | त्यौहार का दिन है आप तो बड़ी हैं इसलिए आप का आशीर्वाद लेने आ गया |
दादी: (निगोड़ा देखो कैसी बात बना रहा है, मन ही मन कोसते हुए) सुखी रहो, नीके रहो भइया | बताओ झाड़-फूक कैसा चल रहल बा?
ओझा: (बात बदलते हुए) मटरू नहीं दिखाई दे रहे हैं?
दादी: यहीं अगल-बगल ही गए है, कुछ काम था क्या? कहो तो बुलवा दूँ?
ओझा “चलो अच्छा हुआ नहीं है” सोचते हुए टिंकू की तरफ मुड़ा और बोला- टिंकू बेटा आज मेला देखने जाओगे न, ओझा बब्बा की तरफ से यह रख लो | ऐसा कहते हुए कुछ रुपये उसने टिंकू की जेब में रख दिए और अपने घर की तरफ मुड़ गया | टिंकू, दादी और रामकली तीनों उसके इस बदले रुख को देख स्तब्ध थे | आज सूरज पश्चिम में कैसे उग गया, दादी ने आश्चर्य से कहा |  

मटरू खुश थे | सारा काम मन मुताबिक़ चल रहा है | घर पहुँचते ही मटरू ने टिंकू के नए नाम से पुकारा, “सुरिंदर कुमार, बाहर तो आओ |” टिंकू तो नहीं आया लेकिन मटरू की अम्मा और रामकली दोनों एक साथ बाहर आ गए | रामकली कुछ बोलती, अम्मा बोल पड़ी | भइया मटरू आज तो गदोरी(हथेली) पर दूब जम गई | मटरू अम्मा को आँख फाड़ कर देखने लगे | उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि वे मटरू का नया नाम ले कर आये हैं और उनसे कोई कुछ पूछ ही नहीं रहा है |  अम्मा ने एक सांस में ओझा के घर पर आने की खबर बताई | मटरू हँसे बिना नहीं रह सके और मन ही मन राम अगर्दी का शुक्रिया भी कहा | अब रामकली और अम्मा मुँह बाए खड़ी थीं | मटरू ने टिंकू को उसके नए नाम से एक बार फिर पुकारा | अम्मा और रामकली ने भी दुहराया “सुरिंदर कुमार” |

पिता और पुत्र मेले की भीड़ में शामिल थे | मटरू के लिए तो अपने जेवार का यह मेला एक अरसे बाद आया है | रास्ते में जाते हुए मटरू अपने बचपन की यादें ताज़ी कर रहे थे | तब से अब कितना कुछ बदल गया था | मेले में खूब घूमे | पुराने दोस्तों से मिले | दूसरों की सुनी, अपनी सुनाई | मिठाई, रेवड़ी और ककनी खरीदी | बेटे और उसके दोस्तों ने जो भी खाया, दिल खोल कर खिलाया | मेले में घूमते हुए एक हस्तेखा विशेषज्ञ से टकरा गए | अभी ओझा की जाल से छूटे ही थे कि हाथ देखने वाले ने अपने जाल में फंसा लिया | कुछ अच्छी-अच्छी बातें बताई और मोटा-मोटी भविष्य उज्जवल कह कर मटरू की जिज्ञासा शांत की |

सूरज डूबने वाला था | हर साल की तरह इस साल भी रावण जलने वाला है | बुराई पर अच्छाई की जीत होने वाली थी | सूरज डूबा, रावण मरा, दुनियाँ में अच्छाई और सद्गुणों का प्रवेश हो गया | इस तरह रावण के मरने और जीने का एक और क्रम समाप्त हुआ | पहले राम ने रावण का वध किया, शायद इसलिए बुराई ख़त्म हो गयी हो पर आज तो नेता लोग तीर चलाते हैं | क्या कोई नेता उल्टा तीर चलाता है जो खुद उसे ही वेध सके? बुराई भले ही न ख़त्म हुई हो पर थोड़े समय के लिए ही सही मटरू के मन में श्रद्धा का समावेश अवश्य हो गया | घर पहुँच कर सुरिंदर ने सबसे पहले दादी को अपने पिताजी के हाथ दिखाने की बात बताई | अब हंसने की बारी दादी की थी |

अम्मा की निश्छल हँसी सुन मटरू भी हँसने लगे | रामकली भी अपनी हँसी नहीं रोक पा रही थी | आखिर कब तक हँसते | फिर सभी शांत हो गए | पर शांत भी कब तक रहते? अंत में अम्मा बोलीं, “शिवचरन तुम्हारी गदोरी में झौवा भर तो लकीरें हैं, लेकिन टेट खाली ही रहती है | उस रेखा वाले से नहीं पूछा ऐसा काहे है? मैं बताती हूँ | एक ठेठ पुरानी कहावत है: “सरग पाने के लिए मरना होता है” | बेटा रिक्शा के आगे भी सोच | खुद तो नहीं पढ़ा-लिखा अब बेटे को आदमी बना | मटरू माँ के मुख से अपना असली नाम सुनकर बिना कुछ कहे माँ की तरफ  एक टक देखते रहे |   
  
   

Tuesday, 12 February 2019

चलते-चलते



चलते-चलते


-राय साहब पाण्डेय


राहों के जाल बुनते गए
क्यूँ हमने इस कदर,
कब मकड़ गया जकड़
हो खुद से बेखबर |

किसकी मंजिल कौन है
राहों को क्या पता ?
हम तो बस चलते रहे  
फुर्र मंजिलें हुईं  |

रास्ते में हमको मिले थे
पोखर के यार दोस्त,
नंगे बदन नहा रहे थे  
हम तो निकल गए |

कांपते हाथों में देखा लाठियाँ
अर्ध-नग्न बदन की वो झुर्रियाँ,
खाली, उदास आँखों की गहराइयाँ
हम तो मुगालते में थे, चलते गए |

रुक जा, ठहर जा एक पल
मिन्नतें भी आईं बार-बार,
पर कदम रुके नहीं, ठिठके नहीं
फांसले बढ़ते गए |

गैरों की बात कौन करे
वो तो गैर थे,
मोहब्बतों का हाथ थाम
हमने क्यूँ झटक दिया?

निर्झरों से बेरोक बहती
जीवन-सुधा की प्रबल धारा,
खुदगर्जी में अंधे हुए हम
विष मिला दिया |

सदियों से एक साथ चलते
दिल के बंधन से बंधे,
कड़वाहटों की बोल घोल हमने
दुश्मन बना लिया |

राह में ठोकर लगी थी 
फिर भी  हम रुके नहीं,
शोहरतों की गफलतों में चलते-चलते
राह को मंजिल समझ लिया |

Saturday, 29 December 2018

दर्पण क्यों टूटा ?




दर्पण क्यों टूटा?


- राय साहब पाण्डेय 
माँ ने शिद्दत से ही सही,
फिर भी शौक से बेटी को दुल्हन बनाया,
विदाई में फ्रेम से मढ़ा हुआ,
फूल-पत्तियों से कढ़ा हुआ,
टीने के बक्से में साया और साड़ी में लपेट कर,
टूटे न इसलिए सहेज कर,
श्रृंगार के एक दर्पण को पहले खुद सीने से लगाया,
उसे ही बेटी का सुहाग मान, गर्म आंसुओं से पिघलाया,
कोई देख न ले, बेटी को बुलाया,
दर्पण को इंगित कर, खुद करके बंद नेत्र, बेटी को दिखाया |

हास में, उपहास में, आस की प्यास में,
चाहत की चाह में, कनखियों की निगाह में,
दर्पण को साफ़ कर, स्वयं को निहार कर,
आँखों में कल के लिए सपने सजाकर,
चुटकियों से माँग को सीधी बनाकर,
सामने जब देखा तो हथेलियों से मुख को छिपा कर,
लाज से शरमा कर, मुड़ती हुई भाग कर,
लड़खड़ाती संभल कर,
जब गिरती तो पाती पिया के हाथ माथ पर |

चुन्नू और मुन्नू की किलकारियों के गूँजे स्वर,
अपने, बेगानों के उलाहनों से पकते कर्ण,
वक़्त कब फुर्र हुआ, आज कब लुप्त हुआ,
भविष्य के तब्दील होते आज का पता न चला,
कल की सुखद आस, झपट गई सख्य साथ,
दुधमुहों की जठर-आग, कर गई बेवश आज,
दुल्हन अब मजदूरिन में कैसे बदल गई?  

स्वामी की राह को निहारती पथराई आँख,
दर्पण में झाँक-झाँक खुद ही मुरझाई आँख,
आँचल से बार-बार दर्पण क्यों साफ़ करे?
सुघर और सुभग रूप अपरिचित क्यों हो चले?
नेत्रों के रक्त तार, अधरों की लालिमा,
कालिमा में कब और कैसे बदल गए?
शिशु की रुदन सुन हो गई तन्द्रा भंग,
ठोकर खा दर्पण भी सह न सका खुद का भार,
सामने ही गिर पड़ा बीचो-बीच चटक कर |

चटके हुए आईने में देख कर सिन्दूरी माँग,
माँग क्यों टेढ़ी हुई?
सालने लगा क्यों दिल को, आया पी का ख़याल,
आईने के टुकड़ों को जल्दी में उठाया,
रहा होश न हवास, कब हो गई लहू-लुहान |

माँ का दिया एक दर्पण ही तो था,
ममता की निशानी वह, प्रीत का सहचर भी,
कैसे फेंक देती?
एक बड़े टुकड़े को संभाल कर रख लिया,
चुटकियाँ अब कांपती थीं, आईने का काम बढ़ गया,
धार को सिन्दूर की डिबिया में डुबाया,
माँग को फिर एक बार में ही सीधी सजाया |

मन को तसल्ली हुई, चलो पिया नहीं रूठा,
पर ख़यालों की दुनियाँ में, ख़याल हुआ झूठा,
मजदूरिन को काम मिले, इसकी गारंटी क्या?
होने लगे फांके अब, फिक्र हुई औलादों की,
मजदूरिन से बनते भिखारिन न देर लगी |

पुनवासिया की जोरू अब गली-गली घूमती,
एक की ऊँगली पकड़, दूसरे से गोंद भरती,
किसी के आह का तो किसी के धिक्कार का,
किसी की फब्तियों का तो किसी की फटकार का
पात्र बनती, हंसी और ठिठोली का दंश सहती,
पालती है बच्चों को, पर नाम उसका नहीं |

इन्तजार ख़त्म हुआ, स्वामी से मिलन की
अब आस जागी, टूटे हुए दर्पण में माँ की  
परछाईं देख आँख भी भर आई,
माँग को सीधी सजाकर, हथेलियों से बंद आँखों
को छुपा कर, टकटकी मन की लगाकर,
बुदबुदाती याचना में जाप कर हरिनाम का |

दोनों की आँख मिली एक क्षण को,
फेर ली निगाह, क्यों इन्तजार व्यर्थ हुआ?
मैंने क्या गुनाह किया ? तुम गुनाहगार क्यूँ ?
कौन सा है लाईलाज रोग पाला ?
आँख तो पथरा गयी थी,
तन-मन भी पथरा गया,
फुसफुसाहटों के वार अब चुभने लगे,
पगली है विधवा तो कब की हुई थी,
पर आज बस उजागर हुआ |
  
खटिया के सिरहाने बैठ,
निस्तब्ध मन सोचने लगा,
दर्पण क्यों टूटा ? माँग तो सीधी सजाई,
पर देव मेरा क्यों रूठा ?
निर्झरो से बहने लगी अविरल बह अश्रु धारा,
माथ का सिन्दूर नहीं, क्या करूँ इस देह का,
टूटा हुआ दर्पण फिर याद आया,
एक नहीं एक साथ अब दो चिताएं जल उठीं |












     










Sunday, 2 December 2018

वृद्ध की दुबिधा




     वृद्ध की दुबिधा
           

सांझ की दुपहरी हो या दोपहर की सांझ,
आँखों में झांकते अनकहे ख़यालों की बात,
मन में लिए आशंका उदासी का प्रतिबिम्ब,
कल की कोई परवाह नहीं आज की है बात |

डर लगता नहीं रात के अंधेरों से बेवजह,
बेगानों का हो मरहम, या अपनों की हो दुत्कार,
बेबस तो कर जाती हैं उजालों की परछाइयाँ,
बेनकाब होती है डंक सनी मन की मधुमक्खियाँ |

बंधनों में जकड़ित रूह, चाहतों की चाह बाकी,
उलझनों में उलझे मन को सुलझने की प्यास बाकी,
तिरष्कृत निगाहों से कूक भरी तामसी मृदुल बात,
असह्य होती सख्त पीड़ा, सहता क्यों शिथिल गात?

कर्ण-हीन, नेत्रहीन बोझ बन काँपते हैं खुद के पाँव,
किस पे करूँ भरोसा आज, कल की करूँ किससे आस?
देह-हीन तन-मन को, ज्योति की हो क्यों पुकार?
मुक्त हो उड़ जाएगा कल, बे-पर ही मालिक के द्वार |


                                                                 - -राय साहब पाण्डेय


Friday, 30 November 2018

अनुपम असम -बिहू


बिहू 
-राय साहब पाण्डेय
रंगाली बिहू की एक झांकी 


मटरू जब पहली बार न्यू बोंगाईगाँव  स्टेशन पर पहुँचे तो वहाँ का नज़ारा कुछ अलग सा दिखा | उस समय वहाँ से आगे जाने के लिए छोटी लाइन ही थी | सभी यात्रियों को अपना-अपना सामान लेकर दूसरे प्लेटफार्म पर खड़ी गाड़ी में पुनः स्थापित होना था | मटरू को इसकी कोई चिंता नहीं थी, अब यह काम उनके लिए उनके नए दोस्त ही ख़ुशी-ख़ुशी कर रहे थे | वैसे भी उनके पास कोई सामान तो था नहीं, और न ही आरक्षण पाने की जद्दोजहद | बड़ी लाइन से छोटी लाइन पर जाते समय मटरू ने देखा कि महिलाओं और पुरुषों का एक ग्रुप, जिसमे छोटी लड़कियों के साथ कुछ वयस्क और अधेड़ उम्र की महिलाएं और पुरुष भी शामिल थे, विशेष असमियाँ परिधान में सजे-संवरे ढोलक के थाप पर नाच रहे थे | पुरुष बीच-बीच में एक अलग तरह की आवाज भी निकाल रहे थे | तुरही वाला पुरुष तो ऐसा व्यस्त था कि उसे कुछ होश ही न हो | सुदूर गाँव-जेवार से पहली बार बाहर निकले मटरू के लिए यह एक अनोखा, अद्भुत और अत्यंत मनोरम दृश्य था | मटरू की नजरें जैसे हटने का नाम नहीं ले रही थीं | उन्हें लगा जैसे यही उनकी मंजिल हो | उनके सहयात्रियों ने लगभग झकझोरते हुए कहा, ‘क्या मटरू जी, यहीं बसने का इरादा है?” उनकी तन्द्रा भंग हुई | अलसाए से मटरू साथियों के साथ चल दिए | छोटी लाइन की इस गाड़ी के सामान्य डिब्बे में इतनी आपाधापी नहीं थी | लोग अपने सहयात्रियों के लिए आसानी से खिसक कर सिकुड़ जा रहे थे | घर से दूर, परिवार छोड़ कर जा रहे इन यात्रियों में लड़ने-झगड़ने के लिए न कोई चाहत थी और न ही आवश्यकता | आखिर अपना वतन छोड़ परदेश कौन जाना चाहता है? सबकी अपनी-अपनी मजबूरियाँ थी | परिवार का भरण-पोषण ही मंजिल और उद्देश्य था | उनकी निर्धनता ही उनके पलायन का एकमात्र कारण था | आखिरकार संपन्न घराने का कोई व्यक्ति मेहनत मजदूरी करने बाहर क्यों जाएगा? यह बात जुदा है कि अपना धर-बार छोड़ जो बाहर निकाल गया, आज वह चार पैसे का मालिक हो गया और जो संपन्न था, शराब और दूसरी लतों का शिकार बन कंगाली के कगार पर पहुँच गया |

साथियों के बीच अन्यमनस्क बैठे मटरू पर सबकी निगाहें थी | कुछ विनोदी स्वभाव के पुरुष भी आस-पास बैठे हुए थे | उनमे से किसी ने मुसुराते हुए टोंका, “लगत बा भैया जी के भाभी याद आवतानी |” किसी अन्य ने फिर चुटकी ली, “नाहीं भैया, ई बात नइखे | ई भैया जी न ऊ नचनियन के बड़ा ध्यान से टुकुर-टुकुर निहारत रहलेन ह, शायद ओन्हनै इयाद आवतानी |” आस-पास के सभी मुसाफिर ठहाका लगाने लगे | मटरू भी अब मुस्कुराए बिना नहीं रह सके | इन सबके मध्य अब तक चुपचाप बैठे एक असमिया मानुष भी मुस्कुरा पड़े | अपना नाम अमित बोरा बताते हुए अपना परिचय दिया और यह भी बताया कि पेशे से वे एक शिक्षक हैं और सामाजिक विषयों में उनकी रुचि रहती है | मटरू ने उनकी तरफ कृतज्ञता का भाव दिखाते हुए हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया | थोड़ी देर के लिए शांति छा गई |

लम्बी यात्रा में लोग बहुत देर तक चुपचाप बैठे नहीं रह सकते | शांति भंग करते हुए मटरू के साथ बैठा यात्री बोरा जी से मुखातिब हुआ, “अच्छा बोरा जी आप तो असम के ही रहने वाले हैं, आप के पुरखे भी सदियों से यहाँ रहते रहे हैं, आप से अच्छा इस असमिया डांस के बारे में भला और कौन बता सकता है? बोरा जी सोचने लगे और फिर मौन तोड़ते हुए कहने लगे, “आप लोग जिस डांस का जिक्र कर रहे हैं वह असम की एक लोक नृत्य की परंपरा में आता है और जिसे हम लोग बिहू नृत्य कहते हैं | लोक नृत्यों की विशेषता है कि बहुत थोड़े या नाम-मात्र के अभ्यास से ही इसे कोई भी कर सकता है | मुस्कुराते हुए बोरा जी ने मटरू के पास बैठे यात्री को ही खड़े होने के लिए कहा | फिर दोनों हाथों को फ़ैलाने के लिए और फिर कमर पर रखने के लिए कहा | इसके बाद दाएं या बाएं झुक कर घूम जाने के लिए कहा और फिर हँसते हुए बताया कि यही बिहू डांस है | साथ बैठे सभी यात्रियों ने एक जोरदार ठहाका लगाया |

बोरा जी एक बार फिर से मुखातिब हुए, पर इस बार गंभीर होकर | बोले, “बिहू असम प्रदेश का एक मुख्य त्यौहार है, जिसे बिहू के नाम से जाना जाता है | असम में तीन अवसरों पर बिहू त्यौहार मनाया जाता है और ये सभी किसी न किसी प्रकार से प्रकृति से ही जुड़े हुए हैं | पहला और मुख्य बिहू रंगाली या बोहाग (बैसाख) बिहू है, जो अभी आप लोग देख कर आये हैं | रंगाली बिहू एक रंगीला, हंसी-ख़ुशी बांटने वाला, हर्ष-उल्लास के साथ नए वर्ष का स्वागत करने वाला वसंतोत्सव है | रंगाली बिहू देश और विदेश के अनेक त्योहारों के साथ सन्निपतित होता है | पंजाब का बैसाखी, कश्मीर का ट्यूलिप फेस्टिवल, मेघालय की प्रमुख जनजाति खासी का ‘शाद सुक माइनसिएम’, तमिलनाडु का ‘चिथिराई’, केरल का कद्म्म्निता, चाइनीज नव-वर्ष तथा थाईलैंड का पोई-संग्कें आदि प्रमुख हैं | इन सभी त्योहारों का जुड़ाव किसी न किसी रूप में प्रकृति की निराली छटा, कला, सौंदर्य, संस्कृति एवं कृषि से ही है | दूसरा कंगाली या काती (कार्तिक) बिहू अक्टूबर महीने में आता है और तीसरा यानी भोगली या माघ बिहू जनवरी महीने में पड़ता है | बोहाग बिहू फसल बोने ( विशेष रूप से धान की रोपाई ) से, काती बिहू फसल की सुरक्षा और पूजा से तथा माघ बिहू फसल की कटाई से सम्बंधित हैं |    

बिहू का जो आधुनिक रूप अब प्रचलित है, वस्तुतः वह विविध संस्कृतियों के समन्वय और मेल-जोल के परिणाम स्वरुप विकसित हुआ है | इसमें आस्ट्रोएशियाटिक, टिबेटो-बर्मन, आर्यन और टाई-शान प्रजातियों का योगदान प्रमुख है | ऐसा माना जाता है कि बिहू शब्द की व्युत्पत्ति देउरी जुबान के बिसू शब्द से हुई है | देउरी मूलतः बोडो-कचारी जनजाति द्वारा बोली जाने वाली जुबान थी | ऊपरी असम की सोनोवाल, कचारी, शुटिया, ठेंगल-कचारी, मोरन, मोटोक, कईबारटा, खासी और जयंतिया इत्यादि जन-जातीय समुदाय बिहू को इस रूप में मनाते थे | बोडो लोग बिहू को बैसागू और दिमासस, तिवा. और राभा जन-जातीय समुदाय इसे बुशु,पिसू या डूमसी के नाम से मनाते हैं |

बिहू परम्परा का प्रथम सन्दर्भ देवधानी बुरांजी (इतिहास) में मिलता है | इसके अनुसार चुटिया राज्य की राजधानी, सदिया पर बिहू के प्रथम दिन ही सन् 1523 में अह्मों द्वारा अचानक उस समय आक्रमण हुआ जब लोग बिहू उत्सव मनाने में मग्न थे | इससे काफी हद तक इस बात को बल मिलता है कि बिहू का मूल(ओरिजिन) सादियाल कचारी और मूल ऑस्ट्रिक समुदायों की परम्पराओं में निहित है | बिहू नृत्य का आधुनिक स्वरुप ढकुआखाना, लखीमपुर के फाट बिहू नृत्य से उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है, जो मिशिंग्स, कईबार्टा और देउरी समुदायों की परम्परों में मिलता है | फाट बिहू नृत्य के कलकारों को अहोम रजा रूद्र सिंहा के शाही रंगभूमि ‘रंग घर’ में नृत्य करने के लिए सन् 1694 में आमंत्रित किया गया था | अह्मों के हाथों मात खाने के बाद बचे-खुचे सादियाल-कचारी लोग राज्य के अन्य भागों जैसे हर्थी-सपोरी, ढकुआखाना आदि स्थानों पर विस्थापित हो गए | ये लोग अपने साथ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी ले कर आये, जो बाद में इनके द्वारा स्थापित देवालयों में प्रतिष्ठित कर दी गईं | इनमे से एक प्रमुख मंदिर ‘हर्थी देवलोई’ भी है | उन्नीसवीं सदी के आते-आते बिहू का आधुनिक रूप पूरी तरह विकसित हो चुका था, जिसे यहाँ के स्थानीय समुदायों के अतिरिक्त अन्य समुदाय के लोग, असमियाँ ब्राह्मण, कायस्थ एवं उच्च कुलीन अभिजात्य वर्गों ने भी अंगीकार कर लिया |

बोरा जी द्वारा विस्तार से बिहू नृत्य के इतिहास के बारे में जान कर आस-पास के सहयात्री प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके | कुछ लोग जम्हाई भी लेने लगे थे | मटरू, जो कि पहली बार इन परम्पराओं और रीति-रिवाजों से गुजरने वाले थे, बड़ी दिलचस्पी से सब सुन रहे थे | उनमे और अधिक जान्ने की उत्सुकता विद्यमान लग रही थी | इस बीच स्टेशन आ गया और चाय वाले ने पुकार लगाई | बोरा जी ने अपने साथ बैठे यात्रियों को चाय पिलाई | बोरा जी अब तीनों बिहू के बारे में और उनके मनाने के तरीकों पर भी बताना प्रारंभ किया |

बोहाग (बैसाख) बिहू  
बैसाख बिहू असमियाँ कैलेंडर के मुताबिक बोहाग माह में ( मध्य अप्रैल ) में मनाया जाता है |  तीनों बिहू में यह बिहू सबसे रंग-विरंगा होने के कारण वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता है और इसी लिए इसका नाम भी रंगाली बिहू है | सात दिनों तक अलग-अलग रीति-रिवाजों में मनाया जाने वाला यह त्यौहार लोगों के जोश का भी परिचायक है | इस बिहू से खेती के सीजन का भी आगाज होता है | किसान धान की फसल के लिए अपने खेतों को तैयार करते हैं | महिलायें स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ असम का विशेष व्यंजन चावल का ‘पीठा’ भी बनाती हैं | बिहू का प्रथम दिन ( बैसाख शुरू होने के पहले का दिन) ‘गोरु बिहू’ के रूप में मनाया जाता है, जिसमे गायों को नदियों में नहलाया-धुलाया जाता है | नहलाने के लिए रात में ही भिगो कर रखी गई कलई दाल और कच्ची हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है | उसके बाद वहीं पर उन्हें लौकी, बैंगन आदि खिलाया जाता है | माना जाता है कि ऐसा करने से साल भर गाएं कुशलपूर्वक रहती हैं | शाम के समय जहां गाय रखी जाती हैं, वहां गाय को नई रस्सी से बांधा जाता है और नाना तरह के औषधि वाले पेड़-पौधों की टहनियों को जला कर मच्छर-मखियों को भगाया जाता है | इस दिन लोग दिन में केवल दही-चिवड़ा खाते हैं |
बिहू का दूसरा दिन (15 अप्रैल) मानू (मनुष्य) बिहू और नव वर्ष के पहले दिन के रूप में भी मनाया जाता है | हर व्यक्ति कच्ची हल्दी के जल से स्नान कर नए कपड़े पहनता है | पूजा-पाठ करने के बाद ही अन्य पकवानों के साथ पीठ-लड्डू का भोग करते हैं | सात दिन के अन्दर 101 प्रकार की हरी पत्तियों वाला साग खाने का भी रिवाज प्रचलित है | परिवार के बड़े-बुजुर्गों का नया वस्र और गमछो देकर सम्मान किया जाता है | संस्कृत के मन्त्रों को ‘नाहर’ पत्तों पर लिख कर छुपाने की भी प्रथा है | ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान् शिव प्रकृति की आपदाओं से संरक्षण प्रदान करते हैं | बिहू से सम्बद्ध गीत ‘बिहू गीत’ के रूप में जाने जाते हैं | इन गीतों के रूप, लय एवं ध्वनि में अलग-अलग क्षेत्रों के मुताबिक अनेक विभिन्नताएं पाई जाती है | इस बिहू के अन्य महत्व भी हैं | इस  समय धरती पर बारिश की पहली बूंदें पड़ती हैं और पृथ्वी नए रूप में सजती है | जीव-जंतु भी नई जिन्दगी की शुरुवात करते हैं | इस बिहू के अवसर पर संक्रांति के दिन से बिहू डांस नाचते हैं | 20-25 युवक-युवतियों की मण्डली ढोल, पेपा, गगना, ताल, एवं बांसुरी के साथ अपने पारंपरिक वस्त्रों में सज-धज कर बिहू नृत्य करते हैं | बिहू के दौरान ही युवक एवं युवतियां अपने मनपसंद जीवन साथी का चुनाव करते हैं | इसलिए असम में बैसाख महीने में ज्यादातर विवाह संपन्न होते हैं | बिहू गीत की एक बानगी:
फूल फुलिसे बोक्षोनतोर
तुमि जन्मोनी बोहागोर
प्रतितु बोहागोटेस मोरोम
जासु तुमक अंतरोर....फूल फुलिसे |
गुन गुनकोई भुमुरा फुले फुले पोरिसे
थुम्पा थुम्पा नाहोर टगोर डाल भोरी फुलिसे |
जन्मोनी तुमई मूर कामोना बाक्षोना.....
तुमई मूर जीवनोर बाक्षोना.........
तुमई मूर बुकुरे कोली .............  |
गांवो में विभिन्न तरह के खेल तमाशों का आयोजन भी होता है | एक अन्य मान्यता के अनुसार ढोल की आवाज से आकाश में बदल आ जाते हैं और बारिश होने लगती है और अच्छी फसल होने की सम्भावना बढ़ जाती है |
बिहू का तीसरा दिन गोसाई (देव) बिहू के नाम से मनाते हैं | घर की साफ़-सफाई के पश्चात देवताओं की मूर्तियों की पूजा की जाती है, इस विशवास के साथ कि आने वाला नया साल बेहद खुशहाल रहेगा |
‘राति’ बिहू चैत्र मास की अंतिम रात्रि को मनाया जाता है | इस अवसर पर स्थानीय महिलाएं एक खुले खेत में एकत्र होकर मशाल जलाती हैं और पुरुष वर्ग बांस और भैंस की सींग से बने वाद्य यंतों को बजाते हैं | ‘कुटुम’ बिहू के दिन लोग अपने सगे-सम्बन्धियों के घर जाते हैं और एक साथ खाना-पीना करते हैं | ‘सनेही’ बिहू मुख्यतः प्रेमी युगलों के लिए खास दिन होता है | यह दिन प्रेम और प्रजनन का प्रतीक है | युवक-युवतियां आपस में मिलते हैं और उपहारों का आदान-प्रद्दन करते हैं | इस विशेष उपहार को बिहुवान कहते हैं | बिहू के अंतिम दिन को ‘मेला’ बिहू के नाम से जानते हैं | पुराने जमाने में राजा अपनी प्रजा के साथ मेले में शरीक होता था | आज भी मेलों का आयोजन होता है और बड़ी संख्या में लोग इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं |



काति (कार्तिक) बिहू

यह साल का दूसरा बिहू है और कार्तिक (मध्य अक्टूबर) महीने में आता है | यह ‘कंगाली’ बिहू के नाम से अधिक प्रसिद्ध है | इन दिनों किसान की फसल खेत में होती है और वर्धिष्णु (बढ़ने वाली) अवस्था में होती है | घरों में अन्न की कमी हो जाती थी, शायद इसी लिए इसे कंगाली बिहू कहा जाता है | लोगों में फसल को लेकर मन में एक विषादपूर्ण स्थिति रहती है | धान की फसल में कीड़े न लगें, इसके लिए घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगा कर पूजा की जाती है और प्रसाद चढ़ा कर दीपक जलाया जाता है ताकि खेती ठीक-ठाक रहे | बढ़ते हुए धान के पौधों को कीड़ों-मकोड़ों और बुरी नज़र से बचाने के लिए ‘रोवा-खोवा’ मन्त्र का उच्चारण किया जाता है | शाम के वक़्त पशुओं को चावल से बना पीठा खिलाया जाता है | ‘बोडो’ जन-जाति के लोग ‘सिजू’ वृक्ष के नीचे दिया जलाते हैं | इस बिहू के दिन एक लम्बे बांस के ऊपरी छोर पर 'आकाशदीप' दिया जलाया जाता है | ऐसी मान्यता है कि इससे मृत आत्माओं को स्वर्ग का रास्ता दिख जाता है | इस प्रथा का प्रचलन कई अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी पाया जाता है |     
भोगली (माघ) बिहू 

भोगाली (माघ) बिहू की एक झांकी
मध्य जनवरी या माघ महीने की संक्रांति के पहले दिन माघ या भोगाली बिहू मनाया जाता है | इस बिहू का नाम भोग शब्द से बना हुआ है इस कारण इसे भोगाली बिहू कहा जाता है | यह समय असम और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में धान की कटाई का होता है | किसान धन-धान्य से भरपूर होता है | अनेक प्रकार के व्यंजन पकाए जाते हैं, जिनमे चावल प्रमुख होता है | इसके अतिरिक्त तिल, नारियल और गन्ना भी इन व्यंजनों का मुख्य भाग होता है | फसल घर में होती है और किसान कृषि-कार्य से मुक्त | लोग रिश्तेदारों के यहाँ जाते है | इस दिन पूरे भारत वर्ष में संक्रांति, खिचड़ी, लोहड़ी, पोंगल आदि त्यौहार भी धूम-धाम से मनाया जाता है | माघ बिहू की पूर्व संध्या (उरुका) पर पुरुष वर्ग (विशेष कर युवा वर्ग) किसी नदी के किनारे खेत में एक अस्थायी झोंपड़ी बना लेते हैं | झोंपड़ी प्रधानतः पुवाल से से बनाई जाती है, जिसे ‘भेलाघर’ कहते हैं | लकड़ी जला कर भोजन बनाया जाता है | हर तरफ सामुदायिक भोज का बोलबाला होता है | आपस में लोग मिठाईयों का आदान-प्रदान भी करते हैं | ‘मेजी’ (अलाव या तपनी) जला कर उरुका की पूरी रात लोग उसके चारों तरफ बिहू गीतों के थाप पर नृत्य करते हैं | असमियाँ लोगों का प्रमुख वाद्य ढोल इस गीत-संगीत का अभिन्न हिस्सा होता है | कुछ नव-युवक रात का फायदा उठा कर इधर-उधर से लकड़ी और सब्जी भी चुरा लेते हैं और इस कार्य में सफल होने पर अति प्रसन्न होते हैं | सुबह होने पर नदी, तालाब या किसी कुंड में स्नान कर मुख्य ‘मेजी’ के चारों ओर एकत्र हो जाते हैं | प्रज्वलित अग्नि में ‘पीठा’ और सुपारी अर्पण करते हैं | अग्नि देव की पूजा की जाती है और इस रश्म के साथ ही फसल के इस मौसम का तिरोधान किया जाता है | अपने-अपने घरों को लौटते हुए अधजले लकड़ी के लट्ठे भी साथ लाते हैं और सुखद परिणाम की अपेक्षा में फलदार वृक्षों के बीच रख देते हैं | दिन में अनेक प्रकार के खेलों जैसे साड़ों, मुर्गों, और बुलबुल की लड़ाई इत्यादि का आनन्द लेते हैं |
एक लम्बी साँस लेते हुए बोरा जी संक्षिप्त में अपना बिहू वृत्तांत समाप्त करते हैं | उनके सारे सहयात्री उनकी तरफ कृतज्ञ भाव से आँखें फाड़कर देखने लगे | कोई उनकी विद्वता तो कोई उनकी वाक्पटुता तो कोई उनकी इस कहानी शैली की तारीफ़ करने लगा | कुछ उत्साही युवक तालियाँ भी बजाने लगे | मटरू अपने घर-द्वार की चिंता, कुछ समय के लिए ही सही, भूल गए | उनकी यह यात्रा इस जीवन की एक सुखद यात्रा बन गई |