काला टीका
बच्चे को नहला-पोछकर
प्यार से वस्त्रों को पहनाकर,
कंघी की, काजल भी लगाया
पर माथ तो अब भी सूना है
इसीलिए तो टीका काला है |
नज़रों की है कुदृष्टि काली
कजरौटे का काजल भी काला,
श्याम सलोने मुख-मंडल को
किसने मुरझाते देखा है?
इसीलिए तो टीका काला है |
बिस्तर पर हो बेटी-बेटा
सिरहाने होता कजरौटा,
नज़रों की काली ताक़त से
क्या पेड़ भी सूखते देखा है?
इसीलिए तो टीका काला है |
बेटी बड़ी हो गई तो क्या ?
कजरौटा गुम गया भी तो क्या?
आँख के कोने में काजल है
अब इसी से काम चलाना है
इसीलिए तो टीका काला है |
बदल गए हैं रीति-रिवाज
मन-मस्तिष्क हैं बदले क्या?
भले माथ पर ना झलके
पर पैर का तलवा काला है
इसीलिए तो टीका काला है |
मन में पसरा इस कदर वहम
मस्तिष्क न माने इसे तो क्या?
ना लगे नज़र, खुश रहे शिशू
माँ की बस यही इबादत है
इसीलिए तो टीका काला है |
-राय साहब पांडेय

No comments:
Post a Comment