Friday, 18 August 2017

मैं जनता ही सही



भाई मैं जनता ही सही

 गली और नुक्कड़ पर, चाय की चुस्की पर
चर्चा आम है जी आप का क्या ख़याल है,
भाई मैं न कोई गायक ना ही कोई शायर
  न मेरा कोई ख़याल न मेरी कोई गजल है |

धत् बुड़बक, इतना दिन तक शहर में रहा
तूँ फिर भी बौड़म का बौड़म ही रह गया?
अरे थोड़ा तो समझो जनता ही जनार्दन है,
 प्रौढ़ है, उसे ही तमाम मसलों की पकड़ है |

हर चाल की काट उसके ही पास होती है
विषय कोई हो आईडिया बेशुमार होती है,
नेताजी ने घुट्टी ऐसी घिसकर पिलाई है
 कि पान की पीक में नेता की उबकाई है |

आजकल नेताजी फैन-क्लबों की भरमार है
फिर भी सदस्य बनने की लम्बी कतार है,
जनता के जनार्दन बनने की कठिन होड़ है
 जनार्दन बहुमत में और जनता अल्पमत है |

कोई मुझे बौड़म कहे यह कैसे सह सकता
जनार्दन न सही, हूँ तो इस देश की जनता,
मैंने भी निकाले कुछ तीर पुराने कमान से
  अंजाने में ही सही पर लग गया निशाने से |
  
  धीरे से उठे, पीक थूंकने का बहाना बनाया  
खिसियानी सूरत बनाई,  इशारों से बुलाया,
  सोचा, लगता तो है बौड़म, पर बुड़बक नहीं   
चलाता हूँ तिकड़म देखें फँसता है या नहीं |

भैया सवाल क्यों, लाइन लगाते क्यों नहीं
यहाँ सवाल का जवाब सवाल है उत्तर नहीं,
कहाँ से हो, क्या करते थे कोई पूछेगा नहीं
 त्रिवेणी में डुबकी भर से पूर्व भी पाप नहीं |

मैंने सोचा, शायद नई-नई जनार्दनी है पाई
तभी तो नुक्कड़ पर अपनी दुकान खुलवाई,
यहाँ एक से एक जनार्दानों का है जमावड़ा
 चलो फूटो यहाँ से, बचाना है अगर थोबड़ा |

प्रबुद्धों की लाइन से हमें कोई गुरेज नहीं
    मुझे सवाल का जवाब चाहिए, सवाल नहीं,    
  भैया, मैं तो आम जनता हूँ, आम ही सही  
 थोड़ी जनता भी चाहिए, सारे जनार्दन नहीं |

-राय साहब पांडेय


   
  

No comments:

Post a Comment