लोकगीत-कजरी (1)
-राय साहब पांडेय
सखी नैहर जाइब खेलै हम
कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (१)
सैंया बाटेन मोर शराबी,
पर हमहूँ हई मयाबी,
हम त मानब नाहीं साजन
क कहनवां
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (२)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
|
जब-जब सावन रिमझिम बरसै,
मोरा कातर मनवां तरसै,
हम त जोही ला, अब बीरन
क पईड़िया
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (३)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
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देखि के सूरत मोर उदासिल,
अम्मा हो गईनी तब पागल
पापा कसि के डटलें,
जात नाहीं काहें ई ससुररिया
बदरिया चाहे जेतना बरसै | (४)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
|
मोरा बालम भइलें
बिल्ली, जब उड़ गई उनकी खिल्ली
रचिकौ नीक न लागे, रस्ते
में गुमसुमियाँ
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (५)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
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नैहर हमरा जब निचकायल,
हमहूँ भईलीं तनिक घायल
माफ़ी माँग लेहलीं, अब
हँसि दो संवरिया
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (६)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
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सखी सैयाँ मरलेन कनखी,
हम तो शरम से हो गई सुर्खी
हमका लाज लागल, झुक
गई मोरी नजरिया
बदरिया चाहे जेतना बरसै
| (७)
---सखी नैहर जाइब खेलै
हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै
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बहुत ही सामयिक भोजपूरी गीत। सावन जल्द ही आने वाला है।
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