Tuesday, 20 June 2017

लोकगीत (कजरी)




लोकगीत-कजरी (1)

-राय साहब पांडेय 
सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै | (१)

सैंया बाटेन मोर शराबी, पर हमहूँ हई मयाबी,
हम त मानब नाहीं साजन क कहनवां
बदरिया चाहे जेतना बरसै | (२)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

जब-जब सावन रिमझिम बरसै, मोरा कातर मनवां तरसै,
हम त जोही ला, अब बीरन क पईड़िया
बदरिया चाहे जेतना बरसै | (३)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

देखि के सूरत मोर उदासिल, अम्मा हो गईनी तब पागल
पापा कसि के डटलें, जात नाहीं काहें ई ससुररिया
 बदरिया चाहे जेतना बरसै | (४)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

मोरा बालम भइलें बिल्ली, जब उड़ गई उनकी खिल्ली
रचिकौ नीक न लागे, रस्ते में गुमसुमियाँ
बदरिया चाहे जेतना बरसै | (५)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

नैहर हमरा जब निचकायल, हमहूँ भईलीं तनिक घायल
माफ़ी माँग लेहलीं, अब हँसि दो संवरिया
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  (६)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

सखी सैयाँ मरलेन कनखी, हम तो शरम से हो गई सुर्खी
हमका लाज लागल, झुक गई मोरी नजरिया
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  (७)
---सखी नैहर जाइब खेलै हम कजरिया,
बदरिया चाहे जेतना बरसै |  

1 comment:

  1. बहुत ही सामयिक भोजपूरी गीत। सावन जल्द ही आने वाला है।

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