हरिना समुझि समुझि बन
चरना
-राय साहब पांडेय
तुम भरो कुलांचे चाहे जितना
मन को सावधान ही रखना,
ऊँची छलांग में भूल न जाना
अपनी हद में सदा ही रहना |
हरिना समुझि समुझि बन चरना(१)
पल-पल दुश्मन घात लगाए
छुप कर बैठे नज़र बचाए,
अधिक दूर तक तुम मत जाना
जड़ से जुड़ कर सदा ही रहना|
हरिना समुझि समुझि बन चरना(२)
हरी-हरी घासों की लोलुपता
में
अंजान राह में मत घुस जाना,
रूखी-सूखी मिले अगर, जी लेना
लोभी गलियारों में मत फँसना
|
हरिना समुझि समुझि बन चरना(३)
सुध-बुध, सयंम खो मत देना
होश-हवास की बलि मत देना,
उत्साह की घातक नादानी में
कर माँ को याद चौकन्ना रहना|
हरिना समुझि समुझि बन चरना(४)
कुटिल चाल की जाल बिछी है
ठगा न जाना बच के रहना,
जीवन का अस्तित्व अभी है
जी लो, कल का पता न करना|
हरिना समुझि समुझि बन चरना(५)
टिप्पणी: इस कविता की पहली पंक्ति बचपन से गुनगुनाता रहा हूँ, लेकिन आगे क्या
था इसका कुछ अता-पता नहीं | इस निर्गुन को पूरा करने का यह एक तुच्छ प्रयास मात्र है |

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