Sunday, 11 June 2017

द डांसर


द डांसर
-राय साहब पांडेय
कई दिनों से चहल-पहल की गहमा-गहमी तेज हो गई थी | जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहे थे, तैयारियाँ जोर पकड़ रही थीं | छोटे, बड़े और बूढ़े भी एक ही चर्चा में मशगूल थे | गाँव-गाँव से मजबूत तख्त जुटाए जा रहे थे | कुछ सयाने जिन्हें वर्षों से इन कामों का अनुभव था और जो इस काम में माहिर माने जाते थे, उनकी एक टीम भी तैयार कर दी गई थी | आखिर, क्षेत्र के एक अत्यंत माने-जाने व्यक्ति की प्रतिष्ठा का सवाल था! ये लोग यह सुनिश्चित करते थे कि सारे तख़्त एक ही उंचाई के हों और मौके का दबाव झेल सकें | ऐसा नहीं था कि जो तख़्त छोटे या कम उंचाई के थे उनकी दरकार नहीं थी | ऐसे तख्तों का इस्तेमाल मुख्य मंच के अतिरिक्त अन्य कामों के लिए हो सकता था | जाहिर है जब इतने बड़े मंच की ज़रूरत है तो तंबू का पैमाना कैसा होगा ! एक बारादरी से काम नहीं चलने वाला, कम से कम दो तो चाहिए ही चाहिए, विशेषज्ञों की मंडली के सदस्यों की ऐसी ही राय थी | जब मालिक के पास पैसा हो, संसाधन हो तो भला चाटुकार लोगों की कमी हो सकती है क्या? एक-एक चीज रखने, लगाने की व्यवस्था और उसका खाका तैयार हो रहा था | मसलन कुर्सियाँ कहाँ रखी जाएंगी, मसलंद कितने होने चाहिए, मुख्य मंच और दर्शकों के बीच में कम से कम क्या फासला रखा जाए वगैरह वगैरह |

इस नाच मंडली का नाम बहुत बड़ा था | पूरे दो-चार कोस के इलाके में इस मंडली का दबदबा था | उस समय गांवों में सिनेमा तो होता नहीं था और टेलीविज़न तो हिंदुस्तान में ही नहीं था | नौटंकी, नाच, गाना ही मनोरंजन का प्रमुख साधन था | अकसर शादी-व्याह के मौके पर नाच-गाना मंडली का बारात में जाना तय ही रहता था | आस पड़ोस के गाँव के लोगों को भी इसका बेसब्री से इंतजार होता था | उन्हें पता होता था कि कब और कहाँ कौन सी मंडली आने वाली है | पार्टी बड़ी है तो नाच मंडली भी नामचीन होगी ही | क्या बच्चे, क्या युवक और क्या बुजुर्ग सभी नाच देखने अवश्य जाते थे | अगर बारात गाँव में ही आने वाली है तो महिलाएं भी नाच का लुत्फ लेने में पीछे नहीं होती थीं | हाँ, नाच मंडली में जाने का सब का आकर्षण अलग-अलग जरूर होता था | बच्चे नाच देखने में कम ड्रामा (तमाशा) देखने में अधिक रूचि लेते थे, जबकि युवक वर्ग डांस में और खासकर फ़िल्मी गानों वाले डांस में अधिक रुचि दिखाते थे | बुजुर्गों की राय कोई मायने नहीं रखती थी | डांस मंडली का मकसद साफ़ होता था | बारातियों से अधिक से अधिक वसूली करना और खासकर अपने उन नचनियों के जरिए जो ज्यादा लोकप्रिय होते थे | अधिकांश नाच मंडलियों में कम उम्र के लड़के (पुरुष) ही डांस करते थे, लेकिन कुछ ज्यादा लोकप्रिय मंडलियों में महिला (लड़की) डांसर भी होती थीं, जो उन्हें आम मंडली से खास बनाती थीं | ये मंडलियाँ भी युवा वर्ग के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होती थीं | कुछ पुरुष नचनियें तो इतने पॉपुलर होते थे कि पूरी डांस मंडली उनके नाम से ही जानी जाती थी | जाहिर है इनका रुतबा इस मंडली में और मंडली मालिक के निगाह में बहुत ख़ास होता था | मालिक इनकी कद्र भी करता था और यत्न करता था कि ये कलाकार इस मंडली को छोड़ कर दूसरी मंडली में शामिल न हो जाएं | पर सभी नाचने वालों की ऐसी किस्मत कहाँ? कुछ दीवाने तो डांस मंडली के साथ-साथ भी भ्रमण करते थे, कुछ तो ऐसे भी थे जो इतने बुरी तरह सम्मोहित थे कि परीक्षा के दौरान भी मंडली का पीछा नहीं छोड़ते थे | उनके अभिभावक परीक्षा केन्द्रों पर पता करते रहते थे कि उनके प्रतिपालित (वार्ड) परीक्षा भी दे रहे हैं या नहीं |

आखिरकार वह दिन भी आ पहुँचा जिसका लोग  बहुत दिनों से राह देख रहे थे | ठाकुर साहब के घर बारात आ ही गई | लेकिन बारात में न तो आम लोगों की कोई दिलचस्पी थी और न ही कोई खास सरोकार | उन्हें तो बस नाच और नचनियों से ही मतलब था | बच्चे इसी उधेड़बुन में थे कि मंडली कौन-कौन सा खेला (ड्रामा) खेलता है | कोई बोलता पहला खेला तो गुलबदन ही होगा तो कोई कहता नहीं सीरी-फरहाद खेलेगा | युवा वर्ग और कुछ अधेड़ उम्र के नौजवान शोहदे इस बात से खुश थे कि अर्बजवा का नाच देखने को मिलेगा | कोई उसके नाक-नक्श का तो कोई उसके हुनर का और कुछ लोग तो उसकी अदा के दीवाने थे | जो लोग पहले से ही उसे नाचते हुए देख चुके थे, उसका इस कदर बयान करते थे कि सुनने वाले उसको देखने के लिए अधीर हो उठते थे |

“क्या डांस करता है बाबू, एकदम गज़ब, तखत तोड़ | दो-दो फीट उछाड़ का जब स्टेज पर पद-चाप पड़ता है तो रसिक दर्शक झूम जाता है, वाह-वाह कर उठता है | तबलची और नगाड़े वाले तो शायद इसी अदा का इंतजार करते हैं | कुछ मनचले बाराती नोटों को दिखा-दिखा कर उसे लुभाते हैं और अपने पास बुलाने की नाकाम कोशिश भी करते हैं | अरबाज़ भी जब लय में होता है तो उसे इन बातों का कोई भान तक नहीं होता | मंडली का मालिक भी सचेत रहता है कि कौन से लौंडे को कहाँ और कितनी छूट देनी चाहिए | अरबाज़ भी अपने नाम के मुताबिक दर्शकों पर अपनी पकड़ इस कदर बनाए रखता है कि दर्शक तो एकदम खो सा जाता है | ससुरे का रंग-रूप, नैन-नक्श और छरहरा बदन उसको दूसरे से बिलकुल अलग कर देता है | अधिकांश दर्शक उसे अनारकली कह कर पुकारते हैं | मंडली में उसके नाम का डंका इस तरह बजता है कि बाकी सभी लौंडे फीके पड़ जाते हैं | दर्शक जब अधिक शोरगुल करने लगते हैं तो मंडली का अगुआ बीच-बीच में अनारकली को भेजने का आश्वासन देता रहता है |”, सुन्दर भैया ने अपनी टोली के लोगों को एकदम तन्मयता के साथ इस कदर बताया कि लोगों की उत्सुकता चरम पर पहुँच गई |

द्वार पूजा के बाद बारात जनवासे में आ गई | कई कोस दूर से नचदेखवा पहुँचने लगे | ठाकुर साहब के गाँव वाले तो सारे के सारे पतैयाझार चले आए | पर दूर गाँव वाले अपने साथ छोटे बच्चों को नहीं ला रहे थे, किशोरों की टोलियाँ ही इनमें अधिक थीं | अधिकांश दर्शक अपना-अपना स्थान पकड़ रहे थे | स्टेज के पास बैठने की मानो होड़ सी लग गई थी | बारातियों के एरिया में गाँव वाले नहीं जा सकते थे | जाहिर है जगह बहुत कम पड़ रही थी | जो दर्शक देर से आ रहे थे उन्हें पीछे खड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं दिख रहा था | अब ऐसे में कुछ घिसे-पिटे अनुभवी लोग नए उपाय भी ईजाद कर रहे थे | कोई पागल की एक्टिंग कर रहा था तो कोई झूठ-मूठ बेहोशी का नाटक | भगदड़ होने से कुछ को जगह मिल जाती थी तो कुछ अपनी जगह खो देते थे | जब इतना कुतूहल और व्यग्रता हो तो समझ लीजिए बच्चे एक जगह पर बैठ सकते हैं क्या? ऊपर से गर्मी चरम पर | सुंदर जैसे कुछ अनुभवी और पेशेवर दर्शक अपना हैंड फैन रख लेते थे | लेकिन एक बार नाच शुरू भर हो जाए गर्मी का आभास एकदम ख़त्म |

उत्सुक बच्चे नाच मंडली के ड्रेसिंग रूम तक पहुँच जाते थे | लड़कों को लड़कियों का कपड़ा पहनते देखना और लड़कियों जैसा श्रृंगार करते देखना भी आगे आने वाले भविष्य के लिए एक सबक होता है | जो लौंडे ढीठ और गब्बर किस्म के थे उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन कुछ ऐसे भी होते थे जो बच्चों से नज़र नहीं मिला पाते थे और शरमा कर दूसरी तरफ मुँह फेर लेते थे | कुछ तो मंडली के सीनियर सदस्यों से शिकायत भी कर देते थे | फिर वह दर्शकों से अनुरोध करता था कि बच्चों को वहाँ से ले जाए | कुछ बच्चे इस फिराक में होते थे कि कौन सा ड्रामा खेला जाएगा, इसका पता कैसे लगाएं?

नचनियों के लिए न तो यह उनका पेशा होता था और न ही उनके कलाकार होने की अनुभूति | यह केवल उनके गरीब परिवारों के लिए आमदनी का एक जरिया होता था | कम उम्र के सुन्दर दिखने वाले छोटी जाति के ये बच्चे नाच मंडली में घुसेड़ दिए जाते थे | किशोर अवस्था तक पहुँचते पहुँचते इनका इतना शारीरिक एवं मानसिक शोषण हो चुका होता था कि अब वे नाच मंडली के अतिरिक्त कोई अन्य  काम के लायक नहीं समझे जाते थे | जब नाच गाने का सीजन नहीं होता था तो इनके लिए कोई और काम मिलना मुश्किल होता था | इनकी भाव-भंगिमाओं में परिवर्तन हो चुका होता था | आज के समय जैसा विग का दौर नहीं था | बाल लम्बे  रखने पड़ते थे | लोगों के तानों को भी झेलना पड़ता था | सब मिला कर एक जिल्लत भरी जिन्दगी इन्हें नसीब होती थी |

जितना बड़ा नाम उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी और विवशता | सब की निगाहें अरबाज़ पर थीं | सजधज कर स्टेज पर रौनक बिखेरने के लिए अनारकली तैयार | नगाड़े गरमाए जा चुके थे | उनकी थाप सुदूर गांवों में सुनाई दे रही थी | धीरे-धीरे पर्दा उठने लगा | अनारकली के पाँव में न जाने क्या अजब का जादू था? लय, थिरकन और घुँघरुओं की आवाज में गजब का तालमेल था | नगाड़ो, तबलों और ढोल के सुर में सुर मिलाते हुए अनारकली कम से कम पंद्रह मिनट तक स्टेज पर दर्शकों को मंत्रमुग्ध करती रही | ऐसे माहौल में भी कुछ दिलफेंक और मनचले दर्शक अपनी हरकतों से बाज नहीं आते | कला से भरपूर ऐसे कलाकार भी इन छिछोरे दर्शकों की बदतमीजी का शिकार हुए बिना नहीं रह पाते थे | एक के बाद एक नचनियें आते गए पर अनारकली की डिमांड कम नहीं हुई | गानों की फ़रमाइश होती रही, अनारकली बारातियों की माँग पूरी करती रही | नाच-गानों और नौटंकी के बीच कब भोर हो गई पता ही नहीं चला |
सुंदर भैया की गोल अब घर जाने के लिए इकट्ठा थी | रात भर जागने के बावजूद भी लोगों का नाच का नशा कम नहीं हुआ था | रास्ते में सुंदर अपने अनुभवों  का दास्तान सुनाना नहीं भूले | उन्होंने एक दिलचस्प वाकया सुनाया |

“दोपहर के वक़्त ऐसे ही एक नाच मंडली का नाच देखने गया था | जून के महीने की भीषण गर्मी पड़ रही थी | तंबू रबी की फसल की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में लगा था | आस-पास कोई पेड़-पौधे भी नहीं थे | थोड़ी दूर पर कुछ झाड़ियाँ जरूर थीं | ऐसे में यदि किसी को लघुशंका की आशंका हो जाए तो समझ लो | अब गर्मी में गाँव में छाता ले कर भला कौन निकलता है? यदि कोई ऐसा करे भी तो मज़ाक का पात्र बने बिना नहीं रह सकता | मैं अपनी जगह से उठा, लोगों का हाथ-पाँव धकियाते बड़ी मुश्किल से तंबू के बाहर निकला | मैं जानता था कि अब पुनः भीड़ में घुसकर अपनी जगह तक पहुँचना नामुमकिन था | मैं सोच ही रहा था कि किधर जाऊं, इतने में एक लड़की एक पुरुष के साथ झाड़ी की तरफ बढ़ रही थी | लड़की तेज क़दमों से जा रही थी | पुरुष अधेड़ उम्र का था, लड़की की चाल से मुकाबला नहीं कर सकता था | तभी एक कर्कश और झुंझलाहट भरी आवाज आई | अरे ससुरा कहाँ जा रहा है? लड़की का कपड़ा क्या पहन लिया नखरे भी करने लगा | बैठ जा यहीं |”, क्या ये नचनियें लड़कियों की पोशाक में सचमुच लड़कियों जैसे शर्मीले बन जाते हैं? ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी भी इन्हें सहनी पड़ती है | सुन्दर भैया ने दार्शनिकों की भांति अपने लब्जों को विराम दिया | टोली के सारे साथी हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहे थे |

नहा धो कर आधी-अधूरी नींद पूरी कर सुंदर की टीम दोपहर का नाच देखने के लिए तैयार थी | ऐसे भी ऐसा मौका बार-बार कहाँ मिलता है फ्री में | टोली के सारे सदस्यों में गज़ब उत्साह था | भरी दुपहरी की तप-तपाती धूप भी इस जोश के सामने ठंढी पड़ती दिख रही थी | टोली तेज कदमों से चल बारात के जनवासे तक पहुँच गई | अब की बार स्टेज के काफी पास ही बैठने की जगह मिल गई | गनीमत थी कुछ लोग रात के अनुभवों से सबक ले कर पंखी भी ले आये थे जिससे गर्मी का प्रकोप, थोड़ा ही सही, कम जरूर हो गया था |

नगाड़ो की तड़तड़ाती, टनटनाती ध्वनि दूर तक अपने होने का आगाज़ बुलंद कर रही थी | मंडली का नाम ऐसे ही थोड़े न बना था ? साज़-आवाज़ के बाद फिर नचनियों की बारी आई | छुटभैये नचनियें एक के बाद एक स्टेज पर आने लगे | दरअसल रात में गहरे मेकअप के बीच इनका चेहरा कुछ और नज़र आता था परंतु दिन के उजाले में इनका रूप कुछ और था | ठाकुरों की बारात थी, बारातियों में युवा रईसों की कोई कमी नहीं थी | चूड़ीदार सिल्क कुर्ते-पायजामें में सजे-धजे, पान का बीड़ा मुँह में दबाए ये बिगड़ैल बाराती नशे में धुत थे | ऐसे भी बारात में किसी भी बाराती के जबान से निकली उलटी सीधी फरमाईस एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है, यह तो ठाकुर रईसों की बारात थी | एक कहावत है न अगर पैसा और समय हो तो आवारा बनने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती |

फरमाईसों का दौर शुरू हुआ | अरबाज़ से कम पर बाराती किसी भी कीमत पर नाच चलाने के हक में नहीं थे | अरबाज़ आया, फरमाईसें भी पूरी की | लेकिन वह भी तो इंसान ही था | कितना नाचता? इधर दुल्हे के बड़े भाई के पास उसके कुछ चाटुकार दोस्त पहुँचने लगे | “भैया ई अर्बज़वा तो अपने को ससुरा बहुत बड़ा कलाकार समझने लगा है | बोलने पर कुछ जवाब ही नहीं देता | सीधी मुँह बात भी नहीं कर रिया | अपने मालिक की भी नहीं सुन रहा | इसका कुछ इलाज तो करही के पड़ी”, दोस्तों ने शिकायती लहजे में बड़े भाई को सुनाया | बारातियों की शिकायत! समाधान तो होना ही चाहिए | दूल्हे का भाई अपने दोस्तों के साथ दनदनाते हुए स्टेज के पीछे पहुँच गया | “अबे वो, इधर देख, का चाही तोका, सुनत काहे नइखे”, बड़े भाई ने कड़क आवाज़ में घुड़की भरे अंदाज में डांटा | अरबाज़ बिना चेहरा उठाए बोला, “ बाबू रात भर नाचे हैं, अभी दुपहरिया में भी दो घंटे से नाच रहा हूँ | थोड़ा सुस्ता लेता हूँ फिर नाचता हूँ | हम काहे मना करेंगे | आखिर नाचने ही तो आए हैं |” दूल्हे का बड़ा भाई मन में सोचा आखिर ठीक ही तो कह रहा है | पर उसके दोस्तों को कुछ ज्यादा ही चढ़ी हुई थी | बोले- भैया देखो ससुरा जबान लड़ाता है | अब क्या? ठाकुर की बारात में ही ठाकुर का अपमान ! वह भी एक नचनिए के द्वारा ! दूल्हे का भाई तड़तड़ाता हुआ गया, अपनी लाईसेंसी गन निकाला और दनदनाते हुआ अरबाज़ के सामने दाखिल हो गया | अरबाज़ कुछ समझता, बोलता इसके पहले ही ठाकुर ने गोली चला दी | “ले नाच, ले बाँध ले घुघरू, बड़ा नाज़ था न इन पैरों के थिरकने का”, फिर तमतमाता चेहरा लिए बड़बड़ाते हुए वहाँ से रफूचक्कर हो गया |

अब क्या था | भीड़ में भगदड़ मच गई | लोग एक दूसरे के ऊपर गिरते पड़ते भागने लगे | जो जिधर रास्ता पा रहा था उधर ही भाग रहा था | गर्मी और उमस में पसीने से नहाए लोगों के पसीने सूख गए | लहू-लुहान अरबाज़ तड़पता चिल्लाता रहा | अनारकली क्रंदन कर रही थी | सारे सलीम फुर्र हो गए थे | सौभाग्य पर इतराओ या न इतराओ, कुछ पता नहीं कब करवट बदल ले !

मंडली के मालिक ने होशियारी दिखाई | बाराती और घराती मालिकों से मिल कर गाड़ी-घोड़े का इंतजाम किया | नज़दीक के अस्पताल में भरती करा दिया | डॉक्टरों ने इलाज करने में कोई हीला-हवाली नहीं की | किसी ने पुलिस में शिकायत करने की जुर्रत नहीं की | पुलिस ने भी इस घटना का कोई संज्ञान नहीं लिया | मामला रफा दफा हो गया | जैसे कुछ हुआ ही न हो | दवा-दारू के साथ कुछ पैसे भी अरबाज़ के जेब में ठूँस दिए गए | अस्पताल से छुट्टी हो गई |

अरबाज़ का मन बैठ गया | सूनी आँखों के आगे मानो अँधेरा छा गया | जो भी मिलता उससे एक ही सवाल पूछता- आखिर मेरा कुसूर क्या था? किस बात की सज़ा मिली मुझे? अब भला आप ही बताइए ऐसे सवालों का कोई क्या जवाब दे? उसके नाच का एक मशहूर गाना याद आ गया, जिसे शायद कुछ बदल कर गुनगुनाना पड़े | “दुनियाँ करे सवाल तो मैं क्या जवाब दूँ” के बजाय “जब मैं करूँ सवाल तो ये दुनियाँ क्या कहे?” ही अधिक उपयुक्त होगा |

अरबाज़ का नाम धीरे-धीरे लोगों की जुबान से ख़त्म हो गया | मंडली में नए नाम उभरने लगे | नाच गाने का व्यापार जस का तस चलता रहा | कैरियर तो था भी नहीं, अरबाज़ की रोजी-रोटी भी छिन गई | भला लंगड़ा क्या नाचेगा? जो भी खेती-बारी का काम मिलता, उसे ही अपनी नियत समझ कर अरबाज़ भाई अपना दिन गुजारने लगे | अरबाज़ ने निकाह भी किया और अपना परिवार भी बनाया | पर अपने गुजरे दिनों के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करते | एक बार बहुत कुरेदने पर  अरबाज़ मियाँ अपने आँसुओं को छुपा न सके | दिल का दर्द आख़िरकार ढरक ही गया | एक निस्तब्धता छा गई | इसके बाद भी भला क्या कोई सवाल-जवाब हो सकता है?


एक के बाद एक पतझड़ आ कर चले गए पर अरबाज़ के जीवन बसंत कभी नहीं आया |

1 comment:

  1. अत्यंत मार्मिक और आज के ग्रामीण समाज पे चोट करती मार्मिक रचना।

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