Tuesday, 30 May 2017







विसहिनवाँ की पुण्यतिथि
भोर के सपने में आज एक आहट जब आई,
लगा, दरवाजे पर किसी ने गुहार है लगाई
फिर ठक-ठक की दस्तक संग आवाज आई,
अरे, द्वार खोलो मैं विसहिनवाँ हूँ मेरे भाई||

मैं चकित, कोई पेड़ भी सपने में आता है?
कटा पेड़ भी कोमल कोपलें निकालता है?
पर यह क्या बूढ़ी जड़ें धीरे-धीरे फैलने लगीं,
बौने पेड़ की विशाल जड़ें खड़ी होने लगीं||

मैंने पूछा कैसे मानूं तुम विसहिनवाँ  हो,
फिर उसके कोपलों से आम निकलने लगे| 
आम को देख शक विश्वास में बदल गया,
आँख आँसू ले मैं उसके गले लिपट गया||

प्यार से बैठाया, ढाढ़स दी, हाल-चाल पूछा,
सांत्वना पा वृद्ध, आश्वस्त हो कर बोला-
भैया, बहुत दिनों से मन कचोट रहा था,
किससे कहूँ, कैसे कहूँ यही सोच रहा था |

मेरी जिज्ञासा जागी, कहा बेफिक्र हो कहो
  अपनी कथा कहो, व्यथा है वह भी बताओ|  
तुम्हारी छाँव में साँस ली, विश्राम किया है,
स्वादिष्ट फल चखे हैं, हम तुम्हारे ऋणी हैं||

वृद्ध ने एक लम्बी साँस ली, शुरुवात की,
तुम्हारे पूर्वजों ने हम तेरह को जन्म दिया|
धूप, गर्मी सह गोपालतरां हरा-भरा किया,
 इस भीट पर सींचा, पाला-पोषा, बड़ा किया||

फिर एक सिरफिरे ने दस को वध दिया
क्योंकि उसे शादी में जाने से मना किया|
दस का गम झेल दिन-रात बड़े होने लगे,
      पहली बार बौराये, हम मस्ती में झूमे गाए||     

नाम का क्या, ऊल-जुलूल भी हो सकते हैं,
मुझको ही देखो, मुझे विसहिनवाँ कहते हैं||
हमारे फलों को देख हमें अपना नाम मिला,
छोटका चौरिहवा, कलुआ करियवा कहलाया|

दिन गुजरते गए, हम बड़े और बड़े होते गए,
तुम्हारी कई पीढ़ियों से हमारे रिश्ते जुड़ गए|
 खेतों में काम कर लोग परिश्रांत जब हो जाते,
  मेरी छाया में बैठ स्वेद सुखाते, गप्पें लगाते||  

वक़्त के साथ हम बड़े से विशाल हो गए,
क्या दंगल पेड़ है! पड़ोसी ऐसा कहने लगे|
पास के बाग-बगीचों में मेरी धाक जम गई,
दूर-पथिकों में मेरी पहचान लैंडमार्क हो गई||

याद है? बड़ों के कंधे बैठ वो हाथ उचकाना,
मेरा भी मेरी टहनियों को ऊपर-नीचे हिलाना|
पत्तों और आमों को छू कर ही खिल-खिलाना,
  मधुर था वृद्ध और बालक का रिश्ता बनाना||  

फिर पके आमों पर निशाने की होड़ शुरू हुई,
मैं तब मुस्कराता रहा, जब कभी तकरार हुई|
आमों को तोड़ खांचे में रख, मेरा पाल पकाया,
मैंने भी कसर नहीं छोड़ी, खूब स्वाद चखाया||

 कुछ आम फिर भी रह जाते थे छुपे डाली में,
 पक्षियों से बच गिरते नीचे पोखरी के पानी में|
  दूर बैठे बच्चों में उन्हें ढूढ़ने की होती थी ललक,
   मुझे भी इस खेल को देखने की होती थी तलब||

मेरे नीचे ही पानी में होती थी सनई की धुलाई,
 घास की धुलाई और उसके अनेक ढेर की सुखाई|
मैं इन सब का प्रत्यक्ष गवाह था, रक्षक भी था,
तुम्हारे लिए ताज़ा वायु श्रोत और प्रहरी भी था||

पखेरुओं का होता था बसेरा हमारी डालों पर,
उनके कलरव से रखते थे नज़र समय पर |
वे हमारे संदेश वाहक थे हमारे बंधुओं तक,
हाय! सब दूर हो गए जो हमारे थे कल तक||


हर सुख-दुःख में, पूजा-पाठ में साथ निभाया,
अपनी सूखी टहनियों को हवन-कुंड में जलाया|
शादी-व्याह, मौके-दर मौके  डालें भी कटवाई,
हमसे क्या भूल हुई, हमें सहनी पड़ी रुसवाई||

क्या नहीं किया हमने तुम्हारी भलाई के लिए?
पर तुमने सब कुछ भुला दिया मतलब के लिए|
सभी के हम, हम पर क्यों अधिकार की लड़ाई,
फिर भी तुम्हारी ज़िद ने कर डाली हमारी कटाई|

रोया, आहें भरी, सिसकियों को नज़रंदाज़ किया
आरे से मुझ पर नहीं, अपनों पर ही वार किया|
हमारी बलि देकर हमें अकाल मौत क्यों दे दिया,
एहसान फरामोश मानव हमें क्यों नर्क भेज दिया||


तुम तो खुद मरते हो, हमें क्यों यह गौरव नहीं?
यह निर्दयता क्यों? यह हमारी नियति भी नहीं|
हमारा कुछ न बिगड़ेगा, खुद की जड़ें मत काटो,
नफ़रत और स्वार्थ छोड़ प्यार पाओ, प्यार बांटो||

आज तुम्हारी पुण्य-तिथि है, इसलिए बहक रहे हो,
विसहिनवाँ जोर से हँसा, मैंने पूछा हँस क्यों रहे हो?
 वृक्षों की पुण्य-तिथि? जन्म-दिन? क्या कभी सुना है?
अनुष्ठान करो, किसी अपने की, आज पुण्य-तिथि है||

-राय साहब पाण्डेय
26.05.2017
     विसहिनवाँ  पर्यावरण का एक प्रतीक है |

2 comments:

  1. Aisa laga fuaji ke liye likha hai. Content is well expressed. You are blessed with all the talents uncle :)

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  2. बड़ी जानदार अभिव्यक्ति है गुरु। गहन चिंतन और दिलचस्प कथानक शैली जो काव्यमय है, काबिले तारीफ है। राय साहब जी रचनात्मक गहराई देख कर ताज्जुब होता है । राय साहब आप बहुत बढ़िया इंसान हो प्रिय भी। हार्दिक शुभकामनाएं👌💐💐

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