रिश्तों की रंगोली
परिवारों के इस हवन कुंड में
बलि का बकरा कभी न होना,
अगर कभी आफत भी आये
रिश्तों को बलिदान न करना |
बलिदान की नौबत यदि आए
तो अहंकार की बलि दे
देना,
मन-मुटाव तुम दूर ही
रखना
बच्चों की आहुति मत
देना |
बा-मुश्किल रिश्ते बनते हैं
मर्यादा इनकी रखो बना कर,
आज नहीं फिर कब समझोगे
सब कुछ कर के ही न्योछावर?
हवन कुंड को प्रज्वलित
रखो
निज प्रभुता की भेंट
चढ़ाकर,
थोथे-घमंड से दूर ही
रहना
कलुषित मन को सदा भुलाकर|
फतह भले ही कर लो दुनियाँ
खुशी मिलेगी केवल घर पर,
कड़वाहट का स्वाद भुला दो
तकरारों की चिता जलाकर |
मतभेदों की आहुति देकर
प्रतिवादों का कर दो
अंत
स्पर्धाओं को हवन बनाकर
भस्म करो रंजिशें
तुरंत |
गुल गुलशन आबाद रहेगा
घर फुलवारी भी चमकेगी,
माली बन सींचो यह उपवन
फिर यह बगिया भी गमकेगी |
मानापमान,
मिथ्याभिमान से
करनी होगी रिक्त यह
झोली,
हो जाए अरमान भी स्वाहा,
पर
जलने दो, यह रिश्तों की रंगोली |
-राय साहब पांडेय
यह कविता सभी दंपतियों, खासकर नव-दंपतियों को समर्पित
है |

अति सुंदर - A. K. Jain
ReplyDeleteबात बहुत ऊंची है। देवत्व की दिशा में कैसे बढ़ें। दुर्गम पथ है अमल करने का।
ReplyDeleteबढिया रचना है👌👌