Wednesday, 10 May 2017

एक अनकही वेदना





अनकही वेदना
तुम्हारे आने की दस्तक से ही
दिल के तारों में झनकार हुई |
हल्का खुशनुमा अहसास जागा,
फिर एक मधुर मुस्कान खिली||

एक उड़ान ऐसी मन में उमड़ी,
कि अनकही कड़ी यूँ ऐसी जुड़ी,
तन अनजाने में ही झूमने लगा,
पर मन को इसकी सुध न रही|

बाट जोहते वर्तमान भूत हुआ,
सुदूर कल पल में वर्तमान हुआ|
तुम्हारे आने के सुखद बोध से,
क्लेश मिटा दर्द भी काफूर हुआ|

माँ बनने से एक नई पहचान मिली,
रिश्तों में भी एक नई शुरुआत हुई|
पर हाय ! नवजात को क्या हुआ?
अभी तो चंगा था, सुन्न क्यों हुआ?

बच्चे को देख माँ ऐसे सन्न हो गई,
पल भर में ही मानो बदरंग हो गई |
ख़ुशी का ये आलम ग़मगीन हो चला,
सुख–दुःख का ये दौर अब पता चला||


देख माँ की पीड़ा को सब हुए विकल,
शब्द-कोष सूखे, हुई सांत्वना विफल |
मौन सन्नाटा पसरा, आँखें भी पथराईं,
कौन नाप सके इस दुःख की गहराई?

वेदना के भार का जब हुआ तीव्र वार,
निकली एक हिचकी बह चली अश्रु धार|
सूनी गोंद माँ ने जब घर में रखा पैर,
दबी हुई सिसकी की फूट पड़ी चीत्कार||

-राय साहब पांडेय

समर्पित: मातृ-दिवस पर उन सभी माँओं को जिन्हें कभी भी इस दुःख से आत्मसात होना पड़ा हो |
  

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