एक संवाद: आम के पेड़ से
आम के सारे बागीचे अभी अमियों
से लदे पड़े हैं,
गली-गलियारों के बच्चे इन पेड़ों
के बीच खड़े हैं |
किसी के पास ईट-पत्थर तो कोई
डंडों से है लैस,
लक्ष्य साधने का है जुनून, इनमें
हुनर का है तैश||
पेड़ो का क्या ये अचल, खुद चल-फिर
नहीं सकते,
डंडों की मार सह कर भी स्वयं
उखड़ नहीं सकते,
हाँ वेदना तो होती होगी, कराह
भी निकलती होगी,
पर स्वार्थी इंसान का क्या
उसकी तो मौज होगी||
आखिर एक दिन एक छोटे पेड़ ने
गुहार लगाया,
वह तो नादान था शायद पहली
बार था बौराया |
अमियों से लदे नौजवान को था
मन में अभिमान,
बंदर-पंछी, इंसानों को तृप्त
करने का था अरमान||
बिल्कुल तुम्हारा हक़ है तुमने
हमें लगाया है सींचा है,
मौसम की मार से और आपसी
तकरार से बचाया है |
पर हम क्या कम विनम्र हैं फलते
हैं तो झुक जाते हैं,
तो डंडे की मार क्यों, हम तो
इसे देख ही डर जाते हैं||
तब हमारे भी हाथ पाँव थे, हम
बौने नहीं विशाल थे,
प्रजात की भी धाक थी, न हम लूले
थे, न लंगड़े थे|
अपना भी एक नाम था, हम मिठवा
थे, खट्वा भी थे,
किसी के लिए लोढ़वा, कुछ हमें
विसहिनवाँ बुलाते थे||
सोचता हूँ पशु-पक्षी तो नासमझ हैं इन्हें सब्र नहीं है,
मनुष्यों को क्या हो गया ये
क्यों इतने व्याकुल हैं?
धरा पर हम तुम्हारे पुरखे
हैं हमें फरने दो, झरने दो,
तनिक धैर्य धरो, हमें वक़्त
से पकने और टपकने दो!
-राय साहब

बहुत सुंदर संवाद है आपका। इतना प्रेम भाव देखकर , अब आम का पेड़ आपको देखते ही प्रेम से टपकने लगेगा। पेड़ की संवेदना को आपने उकेर दिया कविता में। लाजवाब ������
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