दादियाँ गुदगुदाती
हैं
दादी सब की होती हैं
| उनके सानिध्य में अप्रतिम सुरक्षा का बोध और भरोसा होता है | बच्चों को मुफ्त,
बिलकुल निःस्वार्थ दुलार देती हैं | एक चुम्बन के लिए रिश्वत भी देती हैं | उनके
पास किहिनी (कहानियाँ), दंतकथाओं, आख्यानों, उपाख्यानों, किवदंतियों, रिवायतें एवं
आदर्श चरित्रों का ऐसा अद्भुत और अनुपम संग्रह होता है जो किसी भी बालक के कोमल मन
को हमेशा-हमेशा के लिए एक मानवीय दृष्टिकोण एवं सकारात्मक नजरिया प्रदान करता है |
इससे बच्चे का चारित्रिक विकास तो होता ही है, वे हमेशा के लिए राष्ट्रीय धरोहर बन
जाते हैं | हमेशा तो कोई भी किसी के पास नहीं रहेगा, लेकिन यादों का क्या ये तो
गुदगुदाएंगी ही | प्रस्तुत पंक्तियाँ विश्व की सभी दादियों की स्मृति में हैं |
बात पुरानी है | अरे
यह क्या, बात पुरानी तो होगी ही जब बात दादी की हो रही हो | लेकिन हमेशा ऐसा नहीं
होता | अगर ढेर सारे नाती, पोते-पोतियाँ हों तो वही दादी किसी के लिए अधेड़ होंगी
तो किसी के लिए सचमुच दादी लगने वाली | दादियाँ भी कभी-कभार गुस्सा होती हैं तो
जानते हैं न क्या कहती हैं – चल हट, कलमुहे, मेरे पास तो आना ही मत, जब माँ से
पिटोगे न तब भी नहीं | दादियों के भी कई प्रकार होते हैं | नाउन तो सभी दादियाँ
होती ही हैं, अरे वो ‘बारबर’ वाली नहीं भाई, अंग्रेजी वाली जिसे हिंदी में संज्ञा
बोलते हैं, इसके अतिरिक्त भी कई होती हैं | हाँ, यह अवश्य है कि ये सब की सब
सकारात्मक सोच वाली होती हैं | माता-पिता अकसर अपने बच्चों में खोट ही देखते हैं,
कमियाँ निकालने में कभी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते | हाँ, दूसरे के बच्चों में सब अच्छाई
ही अच्छाई दिखती है | शायद अब ऐसा न होता हो, पर कम से कम हमारे ज़माने में तो ऐसा
ही होता था | लेकिन दादियाँ बिलकुल इसके उलट होती थीं | उन्हें अपने नाती-पोते ही
सबसे गुड़वान नज़र आते थे | जरा सा रोए नहीं कि पूरा घर आसमान पर उठा लेती थीं |
गलती चाहे खुद उनके ही बच्चों की क्यों न हो, ओरहन (उलाहना) ले के पड़ोसी के घर
पहुँच ही जाती हैं | अकसर उलाहने के बाद बच्चा और दादी दोनों खुश होकर घर लौटते थे
| उलाहने का चलन शायद बच्चों को तसल्ली देने के लिए ही शुरू हुआ हो क्योंकि थोड़ी देर के बाद
दादियों और पड़ोसी महिलाओं में आपसी सद्भाव की बातें होने लगती थीं | हाँ, कभी-कभी
यह रंजिश का सबब भी बन जाया करता था |
अब तक तो आप जान ही
गए होंगे कि दादियों का यह कौन सा प्रकार है | हम इसे ‘एडजेक्टिव क्लॉज़’ वाली दादी
के नाम से पुकारते हैं | अधिकांश दादियाँ इसी श्रेणी में आती हैं, जी हाँ इनकी ‘डिग्री’
में फर्क हो सकता है | मसलन कुछ ‘पॉजिटिव’ कुछ ‘कम्परेटिव’ तो
कुछ ‘सुपरलेटिव’ | आप पूछ सकते हैं कि हम इन्हें पहचानेंगे कैसे?, तो मैं स्पष्ट
कर दूँ कि मेरे पास इनकी कोई परिभाषा नहीं है | इसके लिए तो आपको इसे भोगना पड़ेगा,
अपने अतीत में घुसना पड़ेगा और जब मुस्कराते हुए बहार आएंगे न तब परिभाषा-वरिभाषा
के बारे में भूल जाएंगे | ‘पॉजिटिव’ और ‘कम्परेटिव’
दादियाँ तो ठीक हैं, ‘सुपरलेटिव’ दादियाँ गली मोहल्ले वालों के लिए एक “लैंडमार्क” होती हैं
और उनके नाती-पोतों को भी सभी उनकी दादी के नाम से जानते-पहचानते हैं | जैसा मैंने
पहले ही बताया कि सभी की सभी दादियाँ पॉजिटिव ही होती हैं, लेकिन एक से अधिक नाती-पोते
हों तो वे अनजाने में ही, कम से कम अपने घर में, ‘कम्परेटिव’ जरूर हो जाती हैं | कभी
चुन्नू ने पैर दबा दिया तो वह अच्छा हो गया, लेकिन मुन्नू रूठ गया | फिर मुन्नू को
मनाये कौन? आखिर दादी को ही उठना पड़ता था | मेरी दादी भी कुछ ऐसी ही थीं | अपने बच्चे
उन्हें बहुत प्यारे लगते थे, इसका मतलब यह कतई न निकालें कि दूसरे बच्चे उन्हें
अच्छे नहीं लगते थे | शायद इसी लिए वे पूरे गाँव की आजी थीं | किसी के बच्चे को
कोई भी मारे उन्हें हरगिज गवारा नहीं होता था |
आखिर दादी की बात है,
एकाध वाकया तो होना ही चाहिए | गाँव देहात में उन दिनों बाज़ार जाना एक उत्सव से कम
नहीं होता था | घर में सुबह से ही चहल-पहल हो जाती थी | महिलाएँ विशेष रूप से खुश
होती थीं, आखिर कभी-कभार ही तो निकालने का अवसर मिलता था | घी, पिसान, कड़ाही और
लकड़ी का गट्ठर लेकर छोटी उम्र वाली लडकियाँ मंडली में सबसे आगे होती थीं | देवी के
मंदिर में रोट (हलवा-पूड़ी) जो चढ़ाना होता था | तरकारी भी बनती थी, लेकिन उसे घर से
ले जाने की ज़रूरत नहीं होती थी, वह बाज़ार में ही मिल जाती थी | यह दृष्टांत तो बस
ऐसे ही, मेरा वाकया यह नहीं है |
एक दिन शाम के वक्त
दादी बाज़ार के लिए तैयार हो रही थीं | तब मैं काफी छोटा था लेकिन नासमझ नहीं |
बाज़ार जाना मतलब चलकर जाना, कोई अन्य साधन का सवाल ही नहीं | साइकिल के अलावा और
कुछ देखा भी कहाँ था | मैंने ऐसे ही पूछ लिया- दादी मैं भी चलूँ? उन्होंने हाँ कर
दी | मेरे लिए यह बिलकुल अप्रत्याशित था | एक बार में ही हाँ, यकीन नहीं आया | फिर
पूछा | अरे हाँ तो कहा, ले चलूँगी | मैं सातवें आसमान पर, ख़ुशी बता नहीं सकता | आज
भी सोच कर मन आदर और कृतज्ञता से ओत-प्रोत हो उठता है, आँसू आ जाते हैं यह नहीं
कहूँगा | आप शायद यह समझें कि बड़ा कमजोर है | आपकी मर्जी जो समझें, लेकिन आप मुझे
रोक नहीं सकते यह कहने से कि गरम-गरम आँसू आ जाते हैं | दादी और पोता निकल पड़े बाज़ार
के लिए | मैं दादी के साथ कदम से कदम मिला कर कभी उनके आगे तो कभी पीछे चलता रहा |
टेढ़े-मेढ़े रास्तों, बाग़-बगीचों से गुजरते हम आगे बढ़ने लगे | रास्ते काफी संकरे
होते थे या यूँ कहें हम खेत की मेड़ों पर चल रहे थे | रास्ते के दोनों तरफ खेतों
में चने, गेहूँ और सरसों की फसलें लहलहा रही थीं | गन्ने की पेराई और कोल्हाड़ भी
चल रहे थे | गुड़ की महक भी फ़िजाओं में विद्यमान थी | लेकिन उस समय हमें इन सब से
क्या लेना-देना था | यह सब तो हम रोज ही अपने गाँव में देखते थे | हमें तो बस
बाज़ार पहुँचने की छटपटाहट थी | बाज़ार के नज़दीक एक गाँव देख कर मैंने दादी से कहा,
“दादी, इस गाँव में ढेर सारे घर पक्के हैं |” दादी कहाँ चूकने वाली थीं, झट बोल
पड़ी, “जब बड़े हो जाओगे न तब तुम भी ऐसे ही घर बनाना |” मुझे उस समय क्या पता था बड़ा
होना क्या होता है!
आप जब बाज़ार के करीब
पहुँचते हैं न तो अपने आप पता चल जाता है कि अब बाज़ार दूर नहीं है | कुछ पक्के
घरों, दुकानों की सफेदी और उस पर इश्तहार से बाज़ार पहुँचने का अंदेशा हो जाता है |
खैर, नार-खोह पार करके हम दादी के साथ बाज़ार में प्रवेश कर ही गए | दादी ने बाज़ार
में क्या-क्या खरीदा, यह तो मुझे याद नहीं है और न ही इसमें मुझे उस समय कोई रुचि थी
और न ही अब | सारा सामान खरीदने के बाद अंत में दादी एक कपड़े की दूकान पर पहुँची |
उस समय ग्राहकों या गाँव वालों की दुकानें नियत होती थीं | आँख मूँद कर लोग ‘अपनी’
दूकान पर पहुँच जाते थे | दूकान वाला भी उधार में सामान दे देता था, यह कहते हुए
कि पैसा कहाँ जाने वाला है | आप पैसे की चिन्ता न करें, बस सामान खरीदें | दादी ने
कुछ किनारियाँ (किनारेदार मटमैले सफ़ेद रंग की साड़ियाँ) खरीदीं | बाद में ये
साड़ियाँ पीले रंग में रंग दी जाती थीं और फिर वे पियरी बन जाती थीं | मैंने दादी
से हलके से कहा, “दादी एक गंजी ले लो न |” दादी क्या करतीं? इतने दूर पैदल चलकर एक
नन्हा बालक और वह भी उनका पोता एक गंजी ही तो मांग रहा था | मान गईं | दुकानदार से
गंजी दिखाने के लिए कहा | गंजियाँ तो तरह-तरह की थीं, लेकिन खूँट में दाम भी तो
चाहिए | उन दिनों बटुआ या पर्स आम नहीं थे, खासतौर से महिलाएँ अपना पैसा अपने धोती
के पल्लू के एक कोने में बाँध कर रखती थीं, जिसे उन दिनों खूँट कहते थे | सबसे सस्ती
दिखने वाली गंजी पर उँगली रख कर बोलीं – यह वाली दे दो, कितने की है? दुकानदार
बोला- दस आने की है | दादी के पास शायद दस आने ही शेष बचे थे और वे गंजी उधार में
नहीं लेना चाह रही थीं, इसलिए मोल-भाव करना उनकी मजबूरी थी | दुकानदार तो चाह रहा
था कि इसे भी उधार खाते में चढ़ा कर शीघ्र निजात पाई जाए, लेकिन दादी कहाँ चूकने
वाली थीं उन्हें तो गंजी नकद ही चाहिए थी | मोल-भाव शुरू हुआ | बड़े मुश्किल से दुकानदार
साढ़े आठ आने पर आया | दादी को इससे संतुष्टि नहीं थी | वह आठ आने से एक पाई अधिक
देने को राज़ी नहीं थीं | दुकानदार परेशान हो गया, अंत में उसने अस्त्र रख दिए | वह
भी क्या करता, एक तो रोजाना का ग्राहक, दूसरे महिला और सबसे महत्त्वपूर्ण उसका
समय, जो व्यर्थ जाया हो रहा था | मुझे इस मोल-भाव को देख कर बड़ा संकोच हो रहा था, मैं
दुकानदार से नज़र बचा कर इधर-उधर तो कभी दूकान पर बैठे दर्जी के पास चला जाता था |
आखिरकार, डील पक्की हो गई | दादी ने आठ आने दिए और गंजी हमारी | मेरा बस चलता तो
गंजी वहीँ पहन लेता | दादी ने कहा- नहीं यहाँ नहीं घर पर | मैं भी मान गया | गंजी
मुझे ही तो मिलने वाली थी!
अब वापसी की तैयारी
था | सूर्यास्त होने को था | लेकिन मुझे इसका क्या गम था, मेरी दादी जो मेरे साथ
थीं | मुझसे पूछा, कुछ खाओगे? मुझे इतनी तो समझ थी कि दादी क्या खिलाएगी | इतने
मोल-भाव के बाद इसके पास क्या बचा होगा? अगर होता तो इतना मोल-भाव ही क्यों करती |
मैं खामोश था | वह समझ गईं | मुझे एक मिठाई वाली दूकान पर ले गईं | दो आने की
जलेबी खरीदीं | खुद कुछ नहीं खाया, जलेबी का दोना मेरे सामने रख दिया | मैं भी
कितना खाता? बची हुई जलेबियाँ एक नए दोने में बाँध कर झोले में रख लीं | अब हम घर
जाने वाले रास्ते पर थे | रास्ते में मैंने पूछा, “दादी जब आपके पास दस आना था तो
आपने इतने देर तक दुकानदार से इतनी जिरह क्यों की? दादी ने प्यार से अपना खुरदुरा
हाथ मेरे सर और गाल पर रखा फिर बोलीं, “इतनी दूर मेरा लाल मेरे साथ पैदल चलकर आया, क्या मैं उसे भूखे घर वापस ले जा सकती हूँ?” हम दोनों मजे में बातें करते हुए घर
पहुँच गए |
उस समय दादी की बातों का अर्थ मैंने नहीं समझा
था | अब जबकि वे हमारे साथ नहीं हैं, उनकी कही बातों की विशिष्टता का अहसास होता
है और मन श्रद्धा से अभिभूत हो कर स्वयं ही नमन करने लगता है |
-राय साहब पाण्डेय

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