Tuesday, 27 June 2017

रिश्तों की पौध ....




रिश्तों की पौध
-राय साहब पांडेय
मिट्टी में पौधे उगते हैं
घास भी उगती मिट्टी में,
रिश्तों में खुशबू होती है
कड़वाहट भी है रिश्तों में | (१)

मिट्टी जितनी उर्वर होगी
पौध भी उतनी उत्तम होगी,
रखना होगा नमीं बनाकर
वाजिब वर्षा धूप दिखाकर | (२)

नम होते पौधे वारि-धार से
मिटती तपिश की अकुलाहट,
नम होते रिश्ते अश्रु-धार से
बढ़ती  आपस में गरमाहट | (३)

पौधे तो हैं जमीं पर उगते
रिश्ते होते विकिरण जैसे,
इनका अपना ताप न होता
चट्टानों को पिघलाते कैसे? (४)

चाहे रिश्ते हों या फिर पौधे
नाजुकता होती इनमें प्रधान,
आवश्यक हैं कुशल दक्ष हाथ
माली हो या फिर हों किसान | (५)


मिट्टी है तो घास उगेगी
करनी होगी नित निरवाई,
फूल खिलेंगे तब बगिया में
यूं गमकेगी अपनी पुरवाई |(६)

माली हाथों डोर पौध की
श्रम ही है जिसका आधार,
अदृश्य डोर होती रिश्तों की
मूल में जिसके केवल प्यार |(७)

पौधे हों या फिर हों ये रिश्ते
स्वार्थ इन्हें करता है कलुषित,
माली क्या फल की सोचे है?
त्याग नहीं तो रिश्ता दूषित |(८)

समय से पौधे पेड़ बनेंगे
फल देंगे फिर बीज बनेंगे,
नाता गहरा समय से इनका
रिश्ते तब ही परिपक्व बनेंगे |(९)

                     क्रिया-प्रतिक्रिया प्रतिफल में  
                     मनमुटाव न भारी होने पाए,
                     सच्चे रिश्ते भी दैव-योग हैं
                     कुर्बानी देकर इन्हें निभाएं | (१०)
                  
                  
                  
                                               

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