रिश्तों की पौध
-राय साहब पांडेय
मिट्टी में पौधे उगते
हैं
घास भी उगती मिट्टी
में,
रिश्तों में खुशबू
होती है
कड़वाहट भी है रिश्तों में | (१)
मिट्टी जितनी उर्वर
होगी
पौध भी उतनी उत्तम होगी,
रखना होगा नमीं बनाकर
वाजिब वर्षा धूप दिखाकर | (२)
नम होते पौधे वारि-धार
से
मिटती तपिश की
अकुलाहट,
नम होते रिश्ते अश्रु-धार
से
बढ़ती आपस में गरमाहट | (३)
पौधे तो हैं जमीं पर
उगते
रिश्ते होते विकिरण
जैसे,
इनका अपना ताप न होता
चट्टानों को पिघलाते कैसे? (४)
चाहे रिश्ते हों या
फिर पौधे
नाजुकता होती इनमें
प्रधान,
आवश्यक हैं कुशल दक्ष
हाथ
माली हो या फिर हों
किसान | (५)
मिट्टी है तो घास
उगेगी
करनी होगी नित निरवाई,
फूल खिलेंगे तब बगिया
में
यूं गमकेगी अपनी पुरवाई
|(६)
माली हाथों डोर पौध की
श्रम ही है जिसका
आधार,
अदृश्य डोर होती रिश्तों
की
मूल में जिसके केवल प्यार |(७)
पौधे हों या फिर हों ये
रिश्ते
स्वार्थ इन्हें करता
है कलुषित,
माली क्या फल की सोचे
है?
त्याग नहीं तो रिश्ता दूषित |(८)
समय से पौधे पेड़
बनेंगे
फल देंगे फिर बीज बनेंगे,
नाता गहरा समय से इनका
रिश्ते तब ही परिपक्व बनेंगे
|(९)
क्रिया-प्रतिक्रिया
प्रतिफल में
मनमुटाव न भारी
होने पाए,
सच्चे
रिश्ते भी दैव-योग हैं
कुर्बानी
देकर इन्हें निभाएं | (१०)

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